Zero FIR क्या होती है? जीरो एफआईआर कब दर्ज कराई जाती है

What is Zero FIR in Hindi : भारत दुनिया का एक ऐसा देश है, जहां सभ्‍य समाज को सुरक्षा प्रदान करने और अपराधियों को जेल की सलाखों के पीछे भेजने के लिये अपने यहां पर्याप्‍त मात्रा में पुलिसजनों की व्‍यवस्‍था रखता है।

भारत के हर शहर व गांवों में पुलिस चौकिया तथा थानें आदि मौजूद हैं। देश भर में कहीं भी कोई भी आपराधिक अथवा दुर्घटना घटे, वहां सबसे पहले पुलिस अधिकारी ही पहुंचते हैं और कानून व्‍यवस्‍था बहाल करने का प्रयास करते हैं।

Zero FIR in India full Process in Hindi

वैसे तो पुलिस किसी भी घटना की सूचना पर स्‍वत: संज्ञान लेकर तुरंत वहां पहुंच जाती है। लेकिन कई मामलों पर पुलिस को सूचना देने के लिये FIR भी दर्ज करानी होती है।

आज की इस पोस्‍ट में हम आपको FIR और Zero FIR के बारे में विस्‍तार से जानकारी देने जा रहे हैं। क्‍योंकि आपका यह जानना बहुत जरूरी है कि FIR और Zero FIR में आखिर अंतर क्‍या है?

Zero FIR Kya Hai? जीरो एफआईआर क्‍या है? आसान शब्‍दों में समझें

What is Zero FIR in Hindi 2020 : दोस्‍तों, जीरो एफआईआर एक ऐसी व्‍यवस्‍था है, जिसमें अपराधिक घटना का शिकार व्‍यक्ति उस थाने में अपनी शिकायत दर्ज नहीं कराता है, जहां उसके साथ अपराध हुआ है।

ऐसे में पीडि़त पुरूष अथवा कोई महिला दूसरे थानें में अपनी शिकायत दर्ज कराती है, जिस थाना क्षेत्र में अपराध नहीं हुआ है। ऐसे में थानाध्‍यक्ष पीडि़त अथवा पीडि़ता की शिकायत दर्ज कर लेता है, और उस शिकायत संबंधित थाने को भेज दी जाती है।

इस प्रकार की शिकायत / सूचना को (FIR) को ही Zero FIR कहा जाता है। यह एफआईआर बहुत महत्‍वपूर्णं होती है। इसलिये हर किसी को इस बारे में पूरी जानकारी होना बहुत जरूरी है।

Zero FIR पर सुप्रीम कोर्ट की राय क्‍या है?

हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस आर.एस. सोढ़ी के अनुसार उच्‍चतम न्‍यायालय ने अपने एक महत्‍वपूर्णं निर्णंय में कहा था, कि भले ही अपराध किसी भी क्षेत्र में हुआ हो। लेकिन पुलिस जूरीस्डिक्‍शन के आधार पर FIR दर्ज करने से मना नहीं कर सकती है।

पुलिस को हर हाल में पीडि़त व्‍यक्ति की FIR दर्ज करनी ही होगी। भले ही अपराध किसी भी थाना क्षेत्र में हुआ हो।

अगर कोई व्‍यक्ति अपनी शिकायत लेकर ऐसे थाने में पहुंचता है, जिसका वास्‍ता आपराधिक घटना स्‍थल से नहीं है। तो भी पुलिस को शिकयत कर्ता की शिकायत पर कार्रवाही करते हुये FIR दर्ज करनी होगी।

यह एक प्रकार की Zero FIR होगी और उस शिकायत को संबंधित थाने में स्‍थानांतरित कर दिया जाता है। जिसके बाद उस थाने में शिकायत मिलने के बाद जांच की कार्रवाही शुरू हो जाती है।

अदालतों ने अपराध की सूचना तुरंत पुलिस स्‍टेशन में दर्ज करने के लिये अपने पूर्व के फैसलों में स्‍पष्‍ट आदेश दिये हैं। जिसका सीधा अर्थ यह है कि अपराध किसी के साथ भी और कहीं भी हुआ हो, शिकायत (प्राथमिकी) दर्ज करने में देरी और लापरवाही नहीं की जानी चाहिये।

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FIR (एफआईआर) क्‍या है?

जैसा कि हमने आपको ऊपर जीरो एफआईआर के बारे में बताया। आप भ्रमित न हो, इसलिये हम आपको यह भी बताने जा रहे हैं, कि FIR क्‍या होती है?

दोस्‍तों किसी घटना, दुर्घटना अथवा आप‍राधिक घटना की प्राथमिक सूचना को ही FIR कहा जाता है।

पुलिस स्‍टेशन में घटना के ब्‍यौरे को लिखित रूप से दर्ज किया जाता है। जिसकी कॉपी शिकायत कर्ता को दी जाती है। FIR की यह कॉपी बहुत महत्‍वपूर्णं दस्‍तावेज होता है।

इस कॉपी के जरिये आप Insurance क्‍लेम दाखिल कर सकते हैं अथवा अपने साथ घटी घटना के संदर्भ में जांच में लापरवाही होने पर अदलत का दरवाजा भी खटखटा सकते हैं।

FIR किन किन मामलों में दर्ज की जाती है?

अपराध 2 श्रेणीं के होते हैं। मामूली और गैरमामूली अपराध। इन दोनों ही प्रकार के अपराधों को विस्‍तार से समझना आवश्‍यक है। इसलिये नीचे दिये गये बिंदुओं को ध्‍यानपूर्वक पढ़ें।

1 – संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence)

संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की श्रेणीं में बहुत ही गंभीर किस्‍म के अपराध शामिल किये जाते हैं। जैसे रेप, हत्‍या, जानलेवा हमला करना, गोली चलाना आदि।

ऐसे सभी मामलों में FIR तुरंत दर्ज करना अनिवार्य होता है। ऐसे आपराधिक मामलों में CRPC की धारा 154 के तहत पुलिस विभाग को फौरन एफआईआर दर्ज करना आवश्‍यक होता है।

2 – असंज्ञेय अपराध (Non-Cognizable Offence)

यह बहुत मामूली किस्‍म के अपराध होते हैं। जैसे आपसी मारपीट आदि के मामले। इन मामलों में सीधे FIR दर्ज नहीं की जाती है बल्कि इन्‍हें पहले मजिस्‍ट्रेट के पास रेफर कर दिया जाता है।

जिसके बाद मजिस्‍ट्रेट आरोपी व्‍यक्ति को समन जारी करता है। जिसके बाद ही आगे की कार्रवाही शुरू होती है।

असंज्ञेय अपराध के पीडि़त व्‍यक्ति को क्‍या Zero FIR का लाभ मिलता है?

जी नहीं दोस्‍तों, यदि अपराध Non-Cognizable Offence श्रेणी का है। तो जीरो एफआईआर का लाभ नहीं मिलेगा। क्‍योंकि असंज्ञेय अपराध की दशा में तुरंत एफआईआर दर्ज करना जरूरी नहीं है।

ऐसे मामले का संबंध जूरीस्डिक्‍शन हो या न हो तुरंत केस दर्ज नहीं होगा। बल्कि यह मजिस्‍ट्रेट के पास ही रेफर किया जाएगा। इसलिये संबंधित थाने में जाना ही बेहतर विकल्‍प है।

FIR Full Form क्‍या होता है?

एफआईआर का फुल फार्म – First Information Report होता है।

जीरो एफआईआर दर्ज करना क्‍यों जरूरी होता है?

संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की श्रेणीं वाले सभी आपराधिक मामलों में पुलिस को तुरंत Zero FIR दर्ज करनी होती है। इसके अलावा केस ट्रांसफर करने से पूर्व ही मामले की जांच भी शुरू करनी होती है।

ताकि शुरूआती सुबूत नष्‍ट न हों और कोई उन सुबूतो से छेड़छाड़ भी न कर सके। जिस थाने में इस प्रकार की शिकायत दर्ज होती है। वह थाना अपनी शुरूआती जांच रिपोर्ट के साथ बाद में घटना स्‍थल से संबंधित थाने में केस ट्रांसफर करता है। यह पूरी प्रक्रिया जीरो एफआईआर कहलाती है।

रेप केस में Zero FIR कितनी मदतगार साबित होती है?

अक्‍सर देखा जाता है, जब कोई रेप पीडि़ता (बलात्‍कार की शिकार महिला) अपनी FIR दर्ज कराने के लिये संबंधित थाने में जाती है, तो उसे धकिया कर, अपमानित करके भगा दिया जाता है।

कुछ मामलों में ऐसा भी होता है कि बलात्‍कार करने के बाद अपराधी पीडि़ता को किसी दूसरी जगह ले जाकर फेंक देते हैं। अथवा किसी बड़े रैकेट के चंगुल से छूट कर भागी लड़कियां दोबारा उस इलाके में जाकर अपनी FIR दर्ज कराना नहीं चाहती हैं।

ऐसे में Zero FIR एक मात्र ऐसा विकल्‍प होता है, जिसके जरिये वह थाने में अपनी शिकायत दर्ज करा सकती हैं। इस प्रकार के अपराधों के शिकार पीडि़तों की शिकायत दर्ज करने से पुलिस मना नहीं कर सकती है।

जीरो एफआईआर की व्‍यवस्‍था से पुलिस अनजान क्‍यों बनती है?

भारतीय पुलिस का यह दुर्भाग्‍य है, कि वह अक्‍सर आम शहरियों को सुरक्षा प्रदान करने के बजायें अपराधियों का ही सरंक्षण करती हुई दिखाई पड़ती है।

यही कारण है, कि पिछले कई सालों से पुलिस रिफार्म लागू किये जाने की मांग की जा रही है। जब संज्ञेय अपराध से पीडि़त कोई व्‍यक्ति ऐसे थाने में अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिये जाता है, तो थानाध्‍यक्ष अक्‍सर यह कहते हुये पाये जाते हैं, कि आप उस थाने में जाकर शिकायत दर्ज करायें। जहां घटना घटी है।

जब भुक्‍तभोगी व्‍यक्ति यह कहता है कि मैं उस थाने में नहीं जाना चाहता। इसलिये उसकी शिकायत Zero एफआईआर के रूप में इसी थाने में लिखी जाये।

तो पुलिस जीरो एफआईआर की व्‍यवस्‍था से ही अनजान बन जाती है और शिकायत दर्ज करने से अपने हाथ खड़े कर देती है। ऐसी स्थिति में आपको उच्‍चाधिकारियों के चक्‍कर लगाने पड़ सकते हैं।

पुलिस का यह व्‍यवहार उसे कठघरे में खड़ा कर देता है, क्‍योंकि कानून ने लोगों को जो अधिकार दिये हैं, पुलिस उन कानूनों का पालन करने से स्‍वयं ही पीछे हटती हुई नजर आती है। ऐसे में पुलिस पर सवाल उठना शुरू हो जाते हैं।

FIR कौन कौन दर्ज करा सकता है?

FIR को अपराध का शिकार हुआ व्‍यक्ति, उसका कोई रिश्‍तेदारए दोस्‍त अथवा घटना का कोई भी चश्‍मदीद दर्ज करा सकता है। पुलिस किसी को कानूनन एफआईआर दर्ज करने से मना नहीं कर सकती है।

एफआईआर दर्ज कराने के कौन कौन से माध्‍यम इस देश में मौजूद हैं?

  • कोई भी व्‍यक्ति जो अपराध से पीडि़त हुआ है वह स्‍वयं उपस्थित होकर अपने साथ हुई घटना की प्राथमिकी दर्ज करा सकता है।
  • पीडि़त व्‍यक्ति चाहे तो लिखित रूप से स्‍वयं थाने में उपस्थित होकर अपनी शिकायत दे सकता है।
  • आपातकालीन स्थिति में फोन के द्धारा दी गयी सूचना भी बतौर एफआईआर दर्ज की जाती है।
  • कुछ प्रदेशों में मोबाइल एप्‍लीकेशन तथा वेब पोर्टल के जरिये भी FIR दर्ज करने का सिलसिला शुरू हो चुका है।

Zero FIR अथवा FIR दर्ज कराते व कॉपी लेते समय किन बातों को ध्‍यान मे रखना चाहिये?

यदि आप अपने साथ घटित गंभीर किस्‍म के अपराध की FIR दर्ज करा रहे हैं। तो प्राथमिकी दर्ज कराते समय इस बात का जरूर ध्‍यान दें कि एफआईआर में घटना की तारीख, समय तथा आरोपी का उल्‍लेख जरूर हो।

  • एफआईआर दर्ज हो जाने के बाद आप इसकी मुफ्त कॉपी जरूर थाने से प्राप्‍त कर लें। क्‍योंकि यह भविष्‍य की कार्रवाही के लिये बहुत जरूरी होती है।
  • एफआईआर की कॉपी में एक Crime नंबर होता है। जिसका रेफरेंस भविष्‍य में कभी भी आपके काम आ सकता है।
  • एफआईआर की कॉपी लेते समय यह जरूर देख लें कि उस पर थाने की मुहर लगी है या नहीं, इसके अलावा पुलिस अधिकारी के हस्‍ताक्षर होना भी बहुत जरूरी हैं।

क्‍या एफआईआर वापस ली जा सकती है?

यदि कोई व्‍यक्ति जिसने Police Complaint दर्ज कराई है। यदि वह मामले को और अधिक बढ़ाना नहीं चाहता है, तो वह समाज में बैठ कर आरोपी व्‍यक्ति के साथ समझौता कर सकता है और थाने में जाकर दर्ज की गयी शिकायत को वापस भी ले सकता है।

एफआईआर दर्ज कराना और उसे वापस लेना शिकायत कर्ता का मुख्‍य अधिकार है, जिसे आपसे कोई नहीं छीन सकता है।

क्‍या चार्जशीट दाखिल हो जाने के बाद आरोपी FIR निरस्‍त करने की अर्जी दे सकता है?

कानून की दृष्टि से देखें तो, जिस आरोपी व्‍यक्ति के खिलाफ शिकायत कर्ता ने थाने जाकर शिकायत दर्ज कराई और पुलिस ने जांच के उपरांत चार्जशीट भी दायर कर दी है।

ऐसे में आरोपी व्‍यक्ति CRPC की धारा 482 के तहत ऊपरी अदालत में एफआईआर निरस्‍त करने के लिये अपनी याचिका दे सकता है।

यह माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय की नयी व्‍यवस्‍था है। जोकि एक महत्‍वपूर्णं फैसले के बाद अस्तित्‍व में आई है। पहले आपराधिक मामलों में सीआरपीसी की धारा 482 के तहत एफआईआर निरस्‍त करने वाली याचिकायें कोर्ट में स्‍वीकार्य नहीं की जाती थीं।

लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस व्‍यवस्‍था में थोड़ी ढील प्रदान कर दी है। असल में यह व्‍यवस्‍था एक मुकदमें के बाद आई है। असल में मोहता नाम के एक व्‍यक्ति ने बिल्‍डर के साथ मिल कर संपत्ति विकसित करने का एक अनुबंध किया था।

लेकिन बाद में बाइलॉज के पता चला कि उस संपत्ति पर गगनचुंबी इमारत तो बनाई ही नहीं जा सकती है। इसका कारण यह था कि उक्‍त संपत्ति लुटियन जोन में थी। जिसके बाद मोहता जी ने बिल्‍डर को पत्र लिख कर अवगत कराया कि वह संपत्ति को अब विकसित नहीं करना चाहते।

इस पर बिल्‍डर ने उनको दी गयी 1 करोड़ रूपये की वापस मांगी। जिस पर मोहतो ने बिल्‍डर को सुरक्षा राशि नहीं लौटाई। जिसकी वजह से बिल्‍डर ने मोहतो के खिलाफ FIR दर्ज करा दी।

जिसके बाद मोहतो दिल्‍ली हाईकोर्ट चले गये और एफआईआर निरस्‍त करने की मांग की। इस‍ पर कोर्ट ने उनसे कहा कि अभी इस मामले में प्राथमिक जांच चल रही है, इसलिये उनकी याचिका रदद की जाती है।

इसके कुछ समय बाद ही बिल्‍डर के द्धारा दर्ज FIR पर दिल्‍ली पुलिस ने अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी। जिसके बाद श्री मोहतो सुप्रीम कोर्ट गये और सीआरपीसी की धारा 482 के तहत एफआईआर निरस्‍त करने की अर्जी दी।

जिसे स्‍वीकार करते हुये सुप्रीम कोर्ट ने आनंद मोहता मामले में आदेश जारी करते हुये कहा कि यह मामला दीवानी प्रकृति का है। इसमें कहीं कोई गंभीर अपराध साबित नहीं होता है।

अभियुक्‍त द्धारा सुरक्षा राशि न लौटाया जाना एक दीवानी मामला है। इसलिये अभियोजन पक्ष ने जो मामला दर्ज कराया है, वह अदालत में न टिकने वाला और अभियुक्‍त को परेशान करने की नीयत से प्रेरित है।

जीरो एफआईआर अथवा FIR के लिये शिकायत कर्ता के लिये कानूनी प्रावधान क्‍या है?

Zero FIR हो अथवा साधारण दर्ज की जाने वाली प्राथमिकी दोनों ही स्थितियों में शिकायत को सुनना / पढ़ना शिकायत कर्ता का अधिकार होता है। तथा शिकायत कर्ता के लिये कानूनी प्रावधान यह है कि शिकायती को दर्ज एफआईआर पर अपने हस्‍ताक्षर अनिवार्य रूप से करने होंगे।

Zero FIR कैसे करें?

जीरो एफआईअर करने के लिये आप उस थाने में जायें, जहां आप अपनी शिकायत दर्ज कराना चाहते हैं। इसके बाद थाना इंचार्ज से शिकायत दर्ज करने का अनुरोध करें।

आपकी शिकायत लिखित अथवा मौखिक किसी भी रूप में हो, वह दर्ज करने के योग्‍य होती है। जब पुलिस आपकी शिकायत दर्ज कर ले, तब आप पुलिस से उसे पढ़ कर सुनाने का अनुरोध कर सकते हैं।

तो दोस्‍तों यह थी हमारी आज की पोस्‍ट Zero FIR Kya Hai यदि आप Zero FIR Kaise Darj Karaye से संबंधित कोई अन्‍य जानकारी पाना चाहते हैं, तो आप हम से कमेंट बॉक्‍स के जरिये पूछ सकते हैं।

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