महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम 2013 रोकथाम, प्रतिषेध, निवारण

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आजकल महिलाएं हर क्षेत्र में बढ़-चढ़कर काम कर रही हैं। इसके बावजूद कई लोग उन्हें कमतर आंकते हैं एवं उनके उत्पीड़न का कोई मौका नहीं छोड़ते। ढेरों लोग महिलाओं के प्रति लैंगिक उत्पीड़न से भी बाज नहीं आते।

ऐसे में कार्यस्थल पर लैंगिक महिला उत्पीड़न अधिनियम की घटनाओं को रोकने के लिए महिलाओं को सुरक्षित करने एवं लैंगिक उत्पीड़न से संबंधित शिकायतों के निवारण के लिए महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध, निवारण) अधिनियम 2013 लागू किया गया है। आज इस पोस्ट में हम आपको इसी अधिनियम पर विस्तार से जानकारी देंगे। आइए शुरू करते हैं-

महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम क्या है?

दोस्तों, सबसे पहले लैंगिक उत्पीड़न का अर्थ जान लेते हैं। लैंगिक उत्पीड़न वह अवांछनीय यौन व्यवहार, अथवा यौन प्रकृति वाला मौखिक या शारीरिक आचरण है, जिसके परिणाम स्वरूप किसी व्यक्ति के कामकाज में अनुचित हस्तक्षेप होता है। या फिर काम का माहौल भयपूर्ण, शत्रुतापूर्ण या अपमानजनक बन जाता है।

इसी प्रकार कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न से तात्पर्य कार्यस्थल पर महिलाओं के प्रति ऐसे अवांछनीय यौन व्यवहार अथवा मौखिक शारीरिक आचरण से है, जिससे उसके कार्य में अनुचित हस्तक्षेप होता है, अथवा कार्य का माहौल उसके लिए भयपूर्ण, शत्रुतापूर्ण अथवा अपमानजनक बन जाता है।

महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम कब अस्तित्व में आया

महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध, निवारण) अधिनियम आज से आठ साल पहले यानी 2013 में अस्तित्व में आया था। इसे लोकसभा में तीन सितंबर, 2012 को तथा राज्यसभा में 26 फरवरी, 2013 में पारित किया गया। 23 अप्रैल, 2013 में इसे अधिसूचित (sheduled) किया गया। इस अधिनियम (act) के अनुसार लैंगिक उत्पीड़न महिलाओं के समानता के मूल अधिकार, जो संविधान के अनुच्छेद 14, 15 एवं 21 में दिए गए हैं, का उल्लंघन है।

महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम 2013 रोकथाम, प्रतिषेध, निवारण

आपको बता दें कि अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता एवं कानूनों के समान संरक्षण का प्रावधान है। इसमें लैंगिक समानता भी शामिल है। वहीं, अनुच्छेद 15 धर्म, नस्ल, जाति, लिंग जन्मस्थल के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है। इसके साथ ही अनुच्छेद 21 जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है।

महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम में पीड़ित महिला कौन है?

दोस्तों, किसी कार्यस्थल के संबंध में किसी भी उम्र की ऐसी महिला, चाहे नियोजित है अथवा नहीं, जो आरोपी द्वारा लैंगिक उत्पीड़न की शिकायत करती है, वह पीड़ित महिला है। किसी निवास अथवा गृह के संबंध में वह किसी भी उम्र की वह महिला हो सकती है, जो ऐसे किसी निवास स्थान अथवा गृह में नियोजित हो। अक्सर उनकी शिकायतें अनसुनी रह जाती हैं।

इस अधिनियम में कर्मचारी किसको माना गया है

मित्रों आपको बता दें कि महिला उत्पीड़न अधिनियम के अंतर्गत कर्मचारी से आशय एक ऐसी व्यक्ति से है, जो सीधे या किसी एजेंट के माध्यम से, जिसके अंतर्गत ठेकेदार भी है, नियमित, अस्थायी अथवा दैनिक मजदूरी के आधार पर चाहे पारिश्रमिक पर अथवा उसके बगैर नियोजित है अथवा स्वैच्छिक आधार पर कार्य कर रहा है।

एक नजर में कहें तो इसके तहत गैर संगठित क्षेत्रों के श्रमिक, दैनिक मजबूर, घरों में काम करने वाली नौकरानियां, आयाओं आदि सभी को शामिल किया गया है।

अधिनियम के तहत कार्यस्थल की क्या परिभाषा है?

मित्रों, आइए अब आपको बताते हैं कि महिला उत्पीड़न अधिनियम के तहत कार्यस्थल (workplace) की क्या परिभाषा दी गई है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित को शामिल किया गया है-

  • -ऐसा कोई विभाग, संगठन, उपक्रम, उद्यम अथवा कार्यालय आदि जो किसी सरकारी कंपनी अथवा निगम अथवा सहकारी सोसायटी द्वारा स्थापित, उसके स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन हो।
  • -अस्पताल अथवा नर्सिंग होम।
  • -कोई ट्रेनिंग अथवा खेलकूद संस्थान, स्टेडियम, क्रीड़ास्थल आदि। चाहे, वह आवासीय हो अथवा नहीं।
  • -कोई प्राइवेट सेक्टर का संगठन, उद्यम, संस्था, सोसायटी, एनजीओ आदि, जो वाणिज्यिक, व्यावसायिक, शैक्षिक, मनोरंजक, औद्योगिक, स्वास्थ्य सेवाएं एवं वित्तीय क्रियाकलाप करता हो।
  • -कोई निवास स्थान अथवा गृह।

महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम की खास बातें

आइए, अब आपको इस अधिनियम से जुड़ी खास बात बताते हैं, जो किसी को भी जानना अनिवार्य है।

1-कोई भी कोर्ट इस कानून अथवा इसके नियमों के अंतर्गत दंडनीय अपराध का संज्ञान नहीं लेगी, जब तक कि पीड़ित महिला शिकायत दर्ज नहीं कराती। अथवा आंतरिक शिकायत समिति आईसीसी (internal complaint committee) एवं स्थानीय शिकायत समिति एलसीसी (local complaint committee) द्वारा अधिकृत व्यक्ति शिकायत नहीं करता।

2-ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (judicial magistrate) अथवा मेट्रोपाॅलिटन मजिस्ट्रेट (metropolitan magistrate) से नीचे की कोई भी कोर्ट इस कानून के तहत दंडनीय अपराध की सुनवाई नहीं करेगा।

3-इस एक्ट के तहत हर अपराध असंज्ञेय है। यहां असंज्ञेय से तात्पर्य है कि इस अपराध के तहत कोई भी पुलिस अफसर, मजिस्ट्रेट की ओर से जारी वारंट के बगैर आरोपी को गिरफ़्तार (arrest) नहीं कर सकता।

एक्ट 10 से अधिक कर्मचारियों वाले संस्थानों पर लागू

दोस्तों, आपको बता दें कि जिन संस्थानों में दस से अधिक लोग काम करते हैं, यह अधिनियम उन पर लागू होता है। इसके तहत वहां आंतरिक शिकायत समिति का गठन किया जाना आवश्यक है। इसके साथ ही शिकायतों का निवारण भी आवश्यक है। आपको बता दें कि विशाखा गाइडलाइंस को भी महिला उत्पीड़न अधिनियम के प्रावधानों के अंतर्गत शामिल किया गया है।

आपको यह भी जानकारी दे दें कि दिल्ली में 2012 में हुए एक बलात्कार कांड के बाद विशाखा गाइडलाइंस का पालन हर नियोक्ता के लिए आवश्यक कर दिया गया था।

यौन उत्पीड़न लैंगिक भेदभाव का एक गंभीर रूप

आपको बता दें कि यौन उत्पीड़न भेदभाव का एक गंभीर रूप है। यह कार्य में समानता का अवमूल्यन है। इसके अतिरिक्त कार्य करने वालों की गरिमा, इज्जत एवं सलामती के खिलाफ है। सभी मजदूरों को चाहे वह महिला हो अथवा पुरूष, उन्हें ऐसे कार्यस्थल पर काम करने का अधिकार है, जो सुरक्षित, आजाद हों एवं भेदभाव व हिंसा से मुक्त हो।

साथ ही महिलाओं के लिए अपनी जिम्मेदारियां निभाने में सहायक हो, क्योंकि कार्यस्थल एक ऐसी जगह है, जहां वह अपने दिन का अधिकांश समय बिताते है।

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं पर किस तरह के प्रभाव दिखते हैं

मित्रों, यह तो आप जानते ही हैं कि कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न की शिकार महिलाओं पर कई प्रकार के दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं। इनका ब्योरा इस प्रकार से है-

1-मनोवैज्ञानिक नुकसान-पीड़ित महिला का आत्मविश्वास कम हो जाना, अपमानित महसूस होना, कार्य करने की प्रेरणा कम हो जाना।

2- मानसिक नुकसान-पीड़ित महिला का अन्य लोगों से अलगाव, अकेले रहना अथवा अकेलापन महसूस करना, परिवार एवं दोस्तों से भावनात्मक रूप से कट जाना।

3-शारीरिक नुकसान- तनाव की वजह से मानसिक एवं शारीरिक तकलीफ। मसलन नींद गड़बड़ हो जाना, पेट की समस्या, शराब अथवा नशीली दवाओं के सेवन की लत पड़ जाना।

4- व्यावसायिक रूप से नुकसान- पीड़ित का नौकरी छोड़ने पर मजबूर होना अथवा नौकरी के दूसरे अवसर त्याग देना।

महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम का नियोक्ता पर असर-

साथियों, आपको बता दें कि न केवल पीड़ित महिलाओं पर बल्कि संबंधित नियोक्ता पर भी इसका असर पड़ता है। ये दुष्प्रभाव इस प्रकार से हैं-

  • -कंपनी की छवि खराब होना।
  • -यौन उत्पीड़न के डर से नए एवं अच्छे कर्मचारियों का ज्वाइन न करना।
  • -कर्मचारियों में आपसी विश्वास एवं सहयोग की कमी।
  • -कंपनी की तरक्की में रोड़ा।
  • -कंपनी के कानूनी खर्च में बढ़ोत्तरी।
  • -यौन उत्पीड़न के डर से लोगों का काम में मन नहीं लगता। ऐसे में उत्पादन में गिरावट।

अधिकांश महिलाएं लैंगिक उत्पीड़न पर चुप रह जाती हैं –

दोस्तों, अधिकांश महिलाएं लैंगिक उत्पीड़न को जाहिर नहीं करतीं। वे इस तरह के उत्पीड़न पर चुप रह जाती हैं। आप जानते हैं कि महिलाओं को बचपन से ही अपमान का घूंट चुपचाप पी जाने एवं शिकायतों पर मुंह न खोलने की नसीहत दी जाती है।

कई बार इस तरह की नसीहतें उनके जी का जंजाल बन जाती हैं। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न होने पर अधिकांश महिलाएं इसी वजह से चुप हो जाती हैं।

उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत न करने की क्या वजह होती है?

लैंगिक उत्पीडन के खिलाफ महिलाओं के शिकायत करने से पीछे हटने की कई वजहें हैं। इनमें से कुछ इस प्रकार से हैं-

  • -घटना के प्रति शर्मिंदगी एवं अपमान का भाव।
  • -घटना को गंभीरता से न लिए जाने का भय।
  • -घटना का कोई सुबूत न होने से अपने प्रति दूसरों के अविश्वास का डर।
  • -संबंधित व्यक्ति पर कार्यवाही न होने का भय।
  • -नौकरी से निकाले जाने एवं अफवाहों का शिकार होने का डर।
  • -घटना को रिपोर्ट करने पर ‘इन्विटेशन’ के आरोप का डर।
  • -छवि यानी इमेज़ खराब किए जाने का भय।
  • -सामाजिक मान्यताओं को न तोड़ना, जिनमें महिलाओं को बुरे बर्ताव पर चुप रह जाने की सीख दी जाती है।

यदि नियोक्ता एक्ट के प्रावधानों को लागू नहीं करता तो क्या होगा

यदि नियोक्ता इस अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने में विफल रहता है तो उसे न्यूनतम 50 हजार रूपये बतौर अर्थ दंड भरना होगा। हालांकि, सच यह भी है कि सजा के प्रावधान के बावजूद अधिकांश नियोक्ता महिला उत्पीड़न अधिनियम के प्रावधानों को लागू करने में रूचि नहीं दिखाते।

अधिनियम में खामी होने का वह लाभ उठाते हैं। ऐसे में किसी भी नियोक्ता को अधिनियम के प्रावधानों के उल्लंघन पर कोई कड़ी सजा नहीं हो पाती।

अधिनियम में तमाम तरह के प्रावधान होने के बावजूद यह प्रभावी क्यों नहीं

दोस्तों, महिलाओं के लिए बनाए गए इस कानून को लागू किए जाने के बावजूद कई मामलों में यह प्रभावी नहीं दिखता। इसकी कई वजहें हैं। जैसे-

  • -यह यौन उत्पीड़न को अपराध की श्रेणी में नहीं रखता। यह केवल नागरिक दोष मानता है।
  • -यदि पीड़ित महिला इस कृत्य को अपराध के रूप में दर्ज करने की इच्छा रखती है तभी शिकायत दर्ज की जाती है। ऐसे में पीड़ित महिला पर अपने नियोक्ता द्वारा शिकायत वापस लेने का दबाव डाला जाता है।
  • -आपको बता दें कि यह धारा भी 354 के तहत दर्ज की जाती है, जो कि एक सामान्य प्रावधान है। इसे निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों की महिला कर्मियों को कार्यस्थल पर यौन उत्पीडन से बचाने के लिए कानूनी अनिवार्यता के तौर पर शामिल किया गया है।

लैंगिक उत्पीड़न को लेकर आईपीसी में धारा 354ए को जोड़ा गया

भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी (IPC) में धारा 354ए को जोड़ा गया है। इसे महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध, निवारण) अधिनियम-2013 को मंजूरी मिलने के बाद जोड़ा गया है। संशोधित आपराधिक कानून अधिनियम हाल ही में शामिल की गई इस धारा के माध्यम से यौन उत्पीडन के लिए दंड का प्रावधान करता है। इसके तहत निम्न आचरण करने वाले व्यक्ति को यौन उत्पीड़न का दोषी माना जाएगा-

  • -अवांछनीय एवं स्पष्ट यौन संकेतों को व्यक्त करने वाला शारीरिक स्पर्श एवं चेष्टा।
  • -यौन संबंध कायम करने की मांग अथवा अनुरोध।
  • -किसी महिला की इच्छा के खिलाफ उसे अश्लील सामग्री दिखाना अथवा भेजना।
  • -यौन मंतव्यों से जुड़ीं टिप्पणियां करना।

ऐसा करने वाले आरोपित को दोषी साबित होने पर तीन साल का सश्रम कारावास अथवा जुर्माना अथवा दोनों सजाएं एक साथ दी जा सकती हैं।

लैंगिक उत्पीड़न को लेकर 2017 में सोशल मीडिया पर ‘मीटू’ बड़ा आंदोलन बना

2017 में एक महिला पत्रकार के अपने साथ हुए लैंगिक उत्पीड़न के खुलासे के बाद सोशल मीडिया पर मीटू (me too) नाम से बड़ा आंदोलन चला। इसके माध्यम से लाखों कामकाजी महिलाओं ने लैंगिक हिंसा से जुड़े अपने अनुभवों को सोशल मीडिया पर साझा किया।

आपको बता दें कि इनमें अधिकांश महिलाएं मीडिया एवं एंटरटेनमेंट के क्षेत्र से जुड़ी थीं। इस आंदोलन की वजह से कई बड़ी शख्सियत वाले पुरुष नियोक्ताओं के खिलाफ सिरे से जांच शुरू की गई। कई को इस्तीफा तक देना पड़ा।

एक एनजीओ के सर्वे में सामने आई लैंगिक उत्पीड़न की हकीकत

दोस्तों, आपको जानकारी दे दें कि human rights watch नाम की संस्था ने कुछ वर्ष पूर्व लैंगिक उत्पीड़न को लेकर एक सर्वे किया था। इसमें सामने आया कि कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न इतनी सामान्य बात बन गई है कि महिलाओं से इसे सिर्फ स्वीकार करने की उम्मीद की जाती है। हर कोई लैंगिक उत्पीड़न को मामूली बात करार देता है और हर किसी का सुझाव होता है, ‘इस बात को जाने दो’।

महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम 2013 पीडीऍफ़ डाउनलोड –

महिला उत्पीड़न अधिनियम की रिपोर्ट कैसे करें?

दोस्तों, यह बात बिल्कुल सच है कि उत्पीड़न को आप जितना सहते हैं, वह उतना ही बढ़ता है। इसलिए यदि आपके साथ कुछ गलत हो रहा है तो उसकी रिपोर्ट अवश्य दर्ज कराएं। लोग क्या कहेंगे, ऐसा सोचकर उत्पीड़न को चुप रहकर न सहें।

इस बात को याद रखें कि एक आवाज उठती है तो सैकड़ों आवाज साथ उठ जाती हैं। कई बार यह भी होता है कि नियोक्ता के खिलाफ शिकायत करने पर वे झूठे आरोप भी मढ़ते हैं। लेकिन उनसे डरना नहीं चाहिए।

महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम 2013 रोकथाम, प्रतिषेध, निवारण

महिला उत्पीड़न की शिकायत कहां करें?

महिला उत्पीड़न की शिकायत आप वूमेन पावर हेल्पलाइन नंबर 1090 पर कर सकती हैं।

महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम 2013 कब पास हुआ?

महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध, निवारण) अधिनियम 2013 आज से आठ साल पहले सन् 2013 में पास हुआ।

महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम किन प्रतिश्ठानों पर लागू है?

जिन प्रतिष्ठानों में न्यूनतम 10 कर्मचारी काम करते हैं, यह उन संस्थाओं पर लागू है।

अधिनियम के तहत जिस व्यक्ति के खिलाफ शिकायत की गई है, क्या वह अपना पक्ष रख सकता है?

जी हां, अधिनियम के तहत यह प्रावधान किया गया है।

क्या कार्यस्थल पर महिला का यौन उत्पीड़न कोई संज्ञेय अपराध है?

जी नहीं, कार्यस्थल पर महिला का यौन उत्पीड़न एक असंज्ञेय अपराध है।

असंज्ञेय अपराध से क्या आशय है?

असंज्ञेय अपराध से आशय यह है कि कोई भी पुलिस अफसर आरोपित को बगैर मजिस्ट्रेट के वारंट के गिरफ्तार नहीं कर सकता।

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं पर किस तरह का प्रभाव देखने को मिलता है?

वे शारीरिक, मानसिक एवं व्यावसायिक हर प्रकार से पीड़ा झेलती हैं।

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की घटना से नियोक्ता पर क्या असर होता है?

कंपनी की छवि खराब होती है। नए कर्मचारी कंपनी ज्वाइन करने से कतराते हैं। कंपनी के उत्पादन में गिरावट आ सकती है। इसके अतिरिक्त कंपनी के लीगल खर्च भी बढ़ जाते हैं।

दोस्तों, हमने आपको महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न अधिनियम 2013 रोकथाम, प्रतिषेध, निवारण के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी दी। उम्मीद है कि ये पोस्ट आपके लिए बेहद उपयोगी साबित होगी। यदि आप चाहते हैं कि महिलाएं, महिला उत्पीड़न अधिनियम को लेकर जागरूक हों तो इस पोस्ट को अधिक से अधिक साझा करें। इस पोस्ट को लेकर आपके किसी भी तरह के सवाल आप हमे नीचे दिए गए कमेंट बाक्स में कमेंट करके बता सकते हैं। आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत है। ।।धन्यवाद।।

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