कयामत की घड़ी क्या है? इसका आविष्कार किसने किया?

कयामत को किसी ने नहीं देखा। लेकिन जिस तरीके से दुनिया आगे बढ़ रही है, जिस तरह से इंसानी प्रजाति परमाणु हथियार, जलवायु परिवर्तन जैसे खतरों का सामना कर रही है, उसे देखते हुए लगता है कयामत का दिन दूर नहीं। वैज्ञानिकों द्वारा विश्व के समक्ष उपस्थित खतरों एवं उनसे निपटने के प्रयासों के आधार पर प्रत्येक वर्ष प्रलय के रूपक के रूप में कयामत की घड़ी में समय सेट किया जाता है।

कयामत की घड़ी क्या है? इसका आविष्कार किसने किया? वर्तमान में इस घड़ी में क्या समय सेट किया गया है? जैसे सवाल यदि आपको परेशान करते हैं तो आज इस पोस्ट में आपको इन तमाम सवालों के जवाब विस्तार में मिलेंगे। आइए, शुरू करते हैं –

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कयामत क्या होती है? (What is doomsday?)

दोस्तों, सबसे पहले जान लेते हैं कि कयामत क्या होती है? आपने अक्सर लोगों के मुंह से कयामत (doomsday) शब्द का जिक्र सुना होगा। बहुत से लोग कयामत को प्रलय कहकर भी पुकारते हैं। यदि धर्मग्रंथों की बात करें तो कयामत को बहुत बड़ी आफत का दिन भी माना गया है।

कयामत की घड़ी क्या है इसका आविष्कार किसने किया

बहुत से लोगों में यह अंधविश्वास भी है कि कयामत के दिन दुनिया खत्म हो जाएगी। वहीं, बहुत से लोग कयामत से जीवन की समाप्ति को एक नए जीवन के प्रादुर्भाव से जोड़कर भी देखते हैं। दोस्तों, आपको याद होगा कि दुनिया के खात्मे पर एक मूवी 2012 भी बनाई गई थी।

कयामत की घड़ी क्या है? (What is doomsday clock?)

दोस्तों, अब कयामत की घड़ी की बात करते हैं। आपको बता दें कि यह एक प्रतीकात्मक घड़ी है। यानी इसे एक रूपक की भांति इस्तेमाल किया जाता है। इस घड़ी के माध्यम से परमाणु युद्ध यानी एटामिक वार एवं जलवायु परिवर्तन के लगातार नजदीक आते खतरे को भांपा जाता है। इसके माध्यम से पता चलता है कि मानव जाति अपने समूल नाश से कितनी दूर है।

कयामत की घड़ी का आविष्कार किसने किया? (Who has invented the doomsday clock?)

दोस्तों, आपको बता दें कि कयामत की घड़ी का आविष्कार बुलेटिन ऑफ एटॉमिक साइंटिस्ट्स द्वारा किया गया। इस बुलेटिन की स्थापना आज से करीब 79 वर्ष पूर्व यानी सन् 1945 में अमेरिका (America) की मैनहट्टन परमाणु परियोजना (Manhattan atomic project) पर काम करने वाले वैज्ञानिकों द्वारा शिकागो (Chicago) में की गई थी। इन वैज्ञानिकों में अल्बर्ट आइंस्टाइन, जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर के साथ ही अन्य वैज्ञानिक भी शामिल थे।

कयामत की घड़ी के आविष्कार का क्या उद्देश्य था? (What was the objective of inventing doomsday clock?)

दोस्तों, अब सवाल उठता है कि कयामत की घड़ी के आविष्कार की आवश्यकता क्यों पड़ी? यह इसके आविष्कार के पीछे क्या उद्देश्य था? तो दोस्तों आपको बता दें कि मैनहट्टन परियोजना के अंतर्गत ही दुनिया में परमाणु बम का आविष्कार हुआ।

अमेरिका द्वारा द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ये बम जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर गिरा दिए गए, जिनका आने वाली पीढ़ियों पर भी बुरा असर देखने को मिला। उस हमले में करीब एक लाख लोग मारे गए। वह परमाणु युग की शुरुआत थी। इस हमले के बाद वैज्ञानिकों को एहसास हुआ कि उन्होंने सामूहिक विनाश का एक हथियार बना दिया है।

ऐसे में विश्व युद्ध समाप्त होने के ठीक दो साल बाद सन् 1947 में परमाणु बम बनाने की योजना में शामिल वैज्ञानिकों द्वारा कयामत की घड़ी यानी डूम्सडे क्लॉक (doomsday clock) का आविष्कार किया गया। कयामत की घड़ी तकनीक के अनियंत्रित इस्तेमाल के खतरों के बारे में जागरूकता बढ़ाने का प्रयास था। साथ ही इसका उद्देश्य लोगों को आने वाले खतरों के बारे में सचेत करना एवं संस्थानों को बेहतर कदम उठाने के लिए प्रेरित करना था।

क्या कयामत की घड़ी खतरों की भविष्यवाणी है? (Is doomsday clock is prediction of danger?)

बहुत से लोगों को लगता है कि कयामत की घड़ी खतरों की भविष्यवाणी करती है लेकिन दोस्तों ऐसा नहीं है। यह घड़ी खतरों की भविष्यवाणी कतई नहीं करती। अलबत्ता, यह कयामत यानी प्रलय के दिन मानव निर्मित वैश्विक तबाही की संभावना का प्रतिनिधित्व करती है। दूसरे शब्दों में आप यह भी कह सकते हैं कि कयामत की घड़ी अनियंत्रित वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास (uncontrolled scientific and technical development) से मानवता (humanity) को होने वाले खतरों का एक रूपक अथवा प्रतीक है।

कयामत की घड़ी के लिए मौजूदा खतरों की गंभीरता कौन तय करता है? (Who decides the severity of present dangers for doomsday clock?)

दोस्तों, आपको बता दें कि कयामत की घड़ी के लिए मौजूदा वैश्विक खतरों की गंभीरता बुलेटिन का साइंस एंड सिक्योरिटी बोर्ड (science and security board) यानी एसएएसबी (SASB) तय करता है। इसके लिए वह डाटा (data) का इस्तेमाल करता है। जिसके आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है कि हम कयामत यानी हम प्रलय के कितने नजदीक हैं।

वे कौन से प्रमुख खतरे हैं जो कयामत की घड़ी का टाइम सेट करने में आधार बनते हैं? (What are the main dangerous that become basis for setting the time in domestic clock?)

दोस्तों, आपको बता दें कि यह कयामत की घड़ी मूल रूप से परमाणु हथियारों (atomic weapons) से होने वाले खतरे पर केंद्रित थी। लेकिन सन् 2000 के दशक की शुरुआत के बाद से इन खतरों में जलवायु परिवर्तन (climate change) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (artificial intelligence) यानी एआई (AI) की वजह से पैदा हो रहे खतरों को भी शामिल कर लिया गया।

यदि वर्तमान समय की बात करें तो बोर्ड द्वारा दुनिया में परमाणु हथियारों की संख्या व प्रकार, वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की अधिकता /सघनता, समुद्र के जलस्तर में वृद्धि, महासागर में अम्लता का स्तर जैसे आंकड़ों पर भी नजर रखी जाती है। प्रमुख रूप से इन्हीं के आधार पर कयामत की घड़ी में वक्त को सेट किया जाता है। इस दौरान बोर्ड द्वारा विश्व के नेताओं, नागरिकों एवं विभिन्न संस्थानों द्वारा इन खतरों का मुकाबला करने के लिए किए जा रहे प्रयासों/कोशिशों पर भी नजर रखी जाती है।

घड़ी में कौन सा समय प्रलय का प्रतीक है? (On which basis the time of doomsday clock was set?)

दोस्तों, इस घड़ी में रात 12 बजे का समय प्रलय का प्रतीक है। माना जाता है कि जब प्रलय आएगी तो जीवन नष्ट हो जाएगा। यह तो हम आपको बता ही चुके हैं कि बुलेटिन ऑफ एटामिक साइंटिस्ट्स के 17 सदस्यीय एसएएसबी बोर्ड द्वारा प्रत्येक वर्ष शिकागो यूनिवर्सिटी (Chicago University) में टंगी इस कयामत की घड़ी को मौजूदा वैश्विक खतरों के आधार पर रीसेट किया जाता है। सन् 1947 से यह सिलसिला चला आ रहा है।

वर्तमान में कयामत की घड़ी को किस टाइम पर सेट किया गया है? (At present the Doomsday clock has been set on which time?)

दोस्तों, आपको बता दें कि इस वर्ष घड़ी की सुईयों को आधी रात से ठीक 90 सेकेंड पहले के वक्त पर सेट किया गया है। इससे पता चलता है कि दुनिया के सामने अभूतपूर्व खतरा बना हुआ है। यह लगातार दूसरा साल है, जब इस घड़ी को रात 12 बजने से ठीक 90 सेकंड पहले के टाइम पर सेट किया गया है।

कयामत की घड़ी में इस वर्ष 2024 का समय सेट करने के पीछे कौन-कौन से आधार हैं? (What are the basis of setting the time in doomsday clock in this year 2024?)

दोस्तों, आइए अब इस वर्ष यानी 2024 में कयामत की घड़ी में समय सेट किए जाने के पीछे के आधार जान लेते हैं, जो कि इस प्रकार से हैं- रूस-यूक्रेन युद्ध, परमाणु हथियारों में कटौती करने से जुड़े समझौतों में कमी, 2023 का अब तक का सबसे गर्म साल घोषित किया जाना, एआई का तेजी से विकसित होना आदि। दोस्तों, एआई के तेजी से विकसित होने से बड़ा नुकसान यह हो सकता है कि यह विभिन्न देशों के बीच दुष्प्रचार को बढ़ा सकता है। इससे वैश्विक स्तर पर भ्रामक सूचनाएं फैल सकती हैं। इससे हथियारों के इस्तेमाल में बढ़ोत्तरी हो सकती है।

कयामत की घड़ी का समय किस प्रकार बदलता रहा है? (How the time in doomsday clock has been changing?)

दोस्तों, आइए अब एक नजर इस पर डाल लेते हैं कि कयामत की घड़ी में समय किस प्रकार बदलता रहा है। आपको बता दे कि सन् 1947 में जब यह घड़ी बनाई गई थी, तो उस वक्त इसमें सबसे पहले 11.53.00 यानी 11 बजकर 53 मिनट का समय सेट किया गया था।

दूसरे शब्दों में कहें तो उस समय इंसान कयामत से सात मिनट दूर था। यद्यपि बाद में यह अवधि बढ़ गई थी। सन् 1991 में शीत युद्ध (cold war) के खत्म होने के बाद यह अवधि सबसे अधिक थी। उस वक्त इस घड़ी में 12 बजने में 17 मिनट बाकी थे। इसके बाद कोरोना (corona) महामारी के तीन वर्षों के दौरान इस घड़ी ने लोगों की सांसें अटकाई रखीं।

उस समय इस घड़ी की सुईयां आधी रात से 100 सेकेंड पहले पर स्थिर रहीं। सन् 2023 में इस घड़ी की सुईयों को 10 सेकेंड आगे बढ़ाकर 90 सेकेंड पर सेट किया गया था। इस वर्ष भी कयामत की घड़ी यही समय बता रही है। साफ है कि यह अब तक आधी रात के सबसे करीब का समय है। यानी हम प्रलय के सबसे करीब आ चुके हैं।

क्या कयामत की घड़ी की सुई को स्थिर रखा जा सकता है? (Can this doomsday clock be stable?)

दोस्तों, जिस प्रकार विभिन्न देशों के बीच हथियारों की होड़ है, उनका रक्षा बजट बढ़ रहा है जलवायु परिवर्तन की स्थिति बेहद खराब है, और कार्बन डाइऑक्साइड की सघनता लगातार बढ़ रही है, इसे देखते हुए मुश्किल अवश्य है, लेकिन इसे स्थिर अवश्य रखा जा सकता है। इसके लिए दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्तर पर कठिन प्रयास करना होगा।

जो तकनीक मानव जीवन और दुनिया को खतरे में डाल सकती हैं, उनका समझदारी से इस्तेमाल करना होगा। लोगों को इसी समझदारी के लेवल तक ले जाना इस घड़ी का काम है। उन्हें डराना नहीं, बल्कि उन्हें चेताना इसका लक्ष्य है।

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कयामत क्या होती है?

प्रलय को ही कयामत पुकारा जाता है। कहा जाता है किस दिन दुनिया समाप्त हो जाएगी।

कयामत की घड़ी क्या है?

कयामत की घड़ी इस बात की प्रतीक है कि दुनिया के सामने कौन से बड़े खतरे हैं और उसके खात्मे से हम कितनी दूर खड़े हैं।

कयामत की घड़ी का आविष्कार कब किया गया?

कयामत की घड़ी का आविष्कार दूसरा विश्व युद्ध समाप्त होने के तुरंत पश्चात सन् 1947 में किया गया।

कयामत की घड़ी का आविष्कार किसने किया?

कयामत की घड़ी का आविष्कार बुलेटिन ऑफ एटामिक साइंटिस्ट्स द्वारा किया गया।

इस बुलेटिन में कौन-कौन से वैज्ञानिक शामिल थे?

इस बुलेटिन में मैनहट्टन परमाणु परियोजना में काम करने वाले आइंस्टीन, ओपेन हाइमर आदि के साथ अन्य वैज्ञानिक भी शामिल थे।

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कयामत की घड़ी कहां टंगी है?

कयामत की घड़ी शिकागो यूनिवर्सिटी में टंगी है।

कयामत की घड़ी में प्रलय का कौन सा समय है?

आधी रात 12 बजे को कयामत की घड़ी में प्रलय का समय माना गया है।

कयामत की घड़ी में टाइम रीसेट करने का क्या आधार होता है?

इन आधारों की सूची हमने आपको ऊपर पोस्ट में दी है। आप वहां से देख सकते हैं।

कयामत की घड़ी में सबसे पहली बार क्या समय सेट किया गया?

कयामत की घड़ी में सबसे पहली बार सन् 1947 में 11 बजकर 53 का समय सेट किया गया। यानी उस समय हम प्रलय से 7 मिनट की दूरी पर थे।

वर्ष 2024 में कयामत की घड़ी में क्या समय सेट किया गया है?

वर्ष 2024 में कयामत की घड़ी में सुईयां आधी रात 12 बजे से ठीक 90 सेकंड पहले सेट की गई हैं।

दोस्तों, आज इस पोस्ट (post) में हमने आपको जानकारी दी कि कयामत की घड़ी क्या है? इसका आविष्कार किसने किया? वर्तमान में इस घड़ी में क्या समय सेट किया गया है? उम्मीद है कि इस पोस्ट ने आपकी जानकारी में बढ़ोतरी की होगी। ऐसी ही अन्य रोचक पोस्ट पाने के लिए आप हमें नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स (comment box) में कमेंट (comment) करके बता सकते हैं। ।।धन्यवाद।।

प्रवेश
प्रवेश
मास मीडिया क्षेत्र में अपनी 15+ लंबी यात्रा में प्रवेश कुमारी कई प्रकाशनों से जुड़ी हैं। उनके पास जनसंचार और पत्रकारिता में मास्टर डिग्री है। वह गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर से वाणिज्य में मास्टर भी हैं। उन्होंने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय से व्यक्तिगत प्रबंधन और औद्योगिक संबंधों में डिप्लोमा भी किया है। उन्हें यात्रा और ट्रेकिंग में बहुत रुचि है। वह वाणिज्य, व्यापार, कर, वित्त और शैक्षिक मुद्दों और अपडेट पर लिखना पसंद करती हैं। अब तक उनके नाम से 6 हजार से अधिक लेख प्रकाशित हो चुके हैं।
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