नेशनल हाइड्रोजन मिशन क्या है? घोषणा, उद्देश्य, लाभ

देश ने 15 अगस्त, 2021 को आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाई है। कोरोना के चलते कड़ी पाबंदियों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र के नाम संबोधन दिया। इस दौरान उन्होंने नेशनल हाइड्रोजन मिशन ‌को आरंभ किए जाने और देश की आजादी की 100वीं वर्षगांठ तक देश को हरित ऊर्जा संपन्न राष्ट्र बनाने की बात कही। क्या आप जानते हैं नेशन‌ल हाइड्रोजन मिशन क्या है? यदि नहीं तो भी चिंता की कोई बात नहीं। आज इस पोस्ट में हम आपको नेशनल हाइड्रोजन मिशन से जुड़ी सारी जानकारी देंगे। आप बस इस पोस्ट को शुरू से अंत तक ध्यान से पढ़ें। आइए, शुरू करते हैं-

नेशनल हाइड्रोजन मिशन क्या है?

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत को 2047 तक एक ऊर्जा संपन्न राष्ट्र बनाने के लिए इस मिशन के शुभारंभ की घोषणा की है। इसके तहत भारत की प्रगति और आत्मनिर्भरता के लिए ग्रीन हाइड्रोजन एनर्जी यानी हरित स्त्रोतों से हाइड्रोजन बनाने के साथ ही ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों के अधिकतम विकास और दोहन को सुनिश्चित किया जाएगा‌। इसका लक्ष्य भारत को ग्रीन एनर्जी यानी हरित ऊर्जा समेत ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में स्व निर्भर बनाना है।

आपको बता दें कि वर्तमान में देश में जो भी हाइड्रोजन की खपत होती है, वह जीवाश्म ईंधन से आती है। वर्ष 2050 तक कुल हाइड्रोजन का तीन चौथाई हरित यानी इको फ्रेंडली किये जाने का लक्ष्य है। भारत को ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन के साथ ही एक्सपोर्ट में वर्ल्ड सेंटर बनाने का लक्ष्य है।

हाइड्रोजन एनर्जी क्या है?

दोस्तों, यदि आप हाइड्रोजन एनर्जी के बारे में नहीं जानते हैं तो आपको बता दें कि हाइड्रोजन एक बहुत ही किफायती ईंधन है। खास बात यह है कि यह पूरी तरह क्लीन एनर्जी है। यानी इसे वाहनों में ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है और इससे प्रदूषण नहीं होता। इसकी वजह यह है कि हाइड्रोजन को जलाने पर वेस्टेज के रूप में इससे सिर्फ पानी निकलता है। इसीलिए राकेट ईंधन के रूप में इसका इस्तेमाल किया जाता है।

लेकिन इसकी एक दिक्कत यह है कि इसका उत्पादन मुश्किल होता है। साथ ही इसको स्टोर करना भी थोड़ा कठिन और खर्चीला होता है। हाइड्रोजन बहुत जल्दी प्रतिक्रिया देने के कारण तीव्र ज्वलनशील पदार्थ की कैटेगरी में है।

हाइड्रोजन एनर्जी को इतनी अहमियत क्यों?

दोस्तों, आप जानते ही हैं कि प्राकृतिक संसाधनों (natural resources) के लगातार दोहन की वजह से एक दिन यह चुक जाएंगे। ऐसे में ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की खोज और उनका इस्तेमाल वक्त की जरूरत है। हाइड्रोजन एनर्जी भी ऊर्जा का एक बेहतरीन वैकल्पिक स्रोत है, जिसकी अहमियत लगातार बढ़ रही है। हाइड्रोजन को जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिहाज से भी बहुत अहम माना जाता है।

नेशनल हाइड्रोजन मिशन क्या है? घोषणा, उद्देश्य, लाभ

आज आम आदमी जो बिजली इस्तेमाल करता है उसका ज्यादातर हिस्सा थर्मल एनर्जी प्लांट में उत्पन्न होता है। बिजली पैदा करने की यह प्रक्रिया कोयले पर निर्भर है। ऐसे में हाइड्रोजन स्वच्छ ऊर्जा यानी clean energy के रूप में बेहतर मानी जाती है। यह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध भी है। भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए नेशनल हाइड्रोजन मिशन बहुत अहम है।

2022 के बजट में भी नेशनल हाइड्रोजन मिशन का एलान

आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल यानी 2020 के नवंबर महीने में भी नेशनल हाइड्रोजन मिशन की घोषणा की थी। इसे पूरा करने के लिए फरवरी, 2021 के आम बजट में भी इसे लेकर एलान किया गया था। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हरित ऊर्जा स्रोतों से हाइड्रोजन बनाने के लिए 2022 में व्यापक नेशनल हाइड्रोजन एनर्जी मिशन (राष्ट्रीय हाइड्रोजन ऊर्जा अभियान) को शुरू करने का प्रस्ताव रखा था।

अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर नेशनल हाइड्रोजन मिशन से देश को green energy efficient बनाने की बात कही है। यह देश को स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में आगे ले जाने की दिशा में एक बड़ा कदम होगा। ग्रीन एनर्जी प्रदूषण कम करने में भी बहुत कारगर साबित होगी।

भारत की हाइड्रोजन प्लांट लगाने की योजना

दोस्तों, आपको बता दें कि ग्रीन एनर्जी में आत्म निर्भर होने का सपना देख रहे भारत की हाइड्रोजन प्लांट लगाने की योजना है। ये प्लांट हरित ऊर्जा स्रोतों से चलेंगे। हाइड्रोजन का उत्पादन प्राकृतिक गैस, नाभिकीय ऊर्जा, बायोमास, सौर एवं पवन ऊर्जा जैसे अक्षय ऊर्जा स्रोतों से हो सकता है। भारत का लक्ष्य है कि अगले 5 साल में देश में इस्तेमाल होने वाली कुल ऊर्जा में 43 फीसदी हिस्सेदारी अक्षय ऊर्जा की हो।

इस लक्ष्य को प्राप्त करने में हाइड्रोजन एनर्जी की अहम भूमिका होगी। दोस्तों, आपको बता दें कि हाइड्रोजन कारें एक बार टंकी फुल कराने पर 400 से 600 किलोमीटर तक चल सकती हैं। हाइड्रोजन कारों की टंकी केवल सात मिनट में फुल की जा सकती है। लिहाजा, कई आटो कंपनियां अब इसी पर फोकस कर रही हैं।

हाइड्रोजन कितने प्रकार की होती है?

दोस्तों, इस पोस्ट को पढ़ते हुए आपके भीतर ये सवाल जरूर उठा होगा कि बार बार ग्रीन की बात हो रही है। आखिर हाइड्रोजन कितने प्रकार की होती है। आपको बता दें कि हाइड्रोजन एक बेहद हल्की गैस है‌। मानक तापमान और दबाव पर यह एक गैर-विषाक्त, अधातु, गंधहीन, स्वादहीन, रंगहीन और बेहद ज्वलनशील द्विपरमाणुक गैस है। ऑक्सीजन के साथ जलाए जाने पर इससे कोई उत्सर्जन नहीं होता‌। कारों में इसका इस्तेमाल फ्यूल सेल के रूप में किया जा रहा है। यह इतने प्रकार की है-

ग्रे हाइड्रोजन:

भारत में होने वाले हाइड्रोजन उत्पादन में सबसे अधिक हिस्सा ग्रे हाइड्रोजन का होता है। इसे हाइड्रोकार्बन जैसे जीवाश्म ईंधन, प्राकृतिक गैस से निकाला जाता है। इस प्रक्रिया में कार्बंन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन होता है।

ब्लू हाइड्रोजन:

दोस्तों, यह हाइड्रोजन जीवाश्म ईंधन यानी fossils fuel से प्राप्त होती है। इसके उत्पादन में उप उत्पाद के रूप में कार्बन आक्साइड और डाई ऑक्साइड उत्सर्जित होता है। लिहाजा, यह ग्रे हाइड्रोजन की तुलना में बेहतर होती है।

हरित हाइड्रोजन:

मित्रों, इसे सबसे बेहतर माना जाता है। दरअसल, इसके उत्पादन में अक्षय ऊर्जा जैसे- सौर अथवा पवन जैसे प्राकृतिक स्त्रोत का इस्तेमाल किया जाता है।

बिजली के जरिए पानी (H2O) को हाइड्रोजन (H) और ऑक्सीजन (O2) में बांट दिया जाता है। इसके प्रदूषण रहित होने की वजह से ही सरकार अब ग्रीन हाइड्रोजन को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है।

भारत ऊर्जा जरूरतों पर 12 लाख करोड़ से अधिक खर्च करता है।

जी हां, दोस्तों। बेशक 12 लाख करोड़ रुपए एक बहुत बड़ी राशि है‌। अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिये भारत को हर साल इससे भी अधिक राशि खर्च करनी पड़ती है। मित्रों, आप लोग भी इस तथ्य से अवश्य वाकिफ होंगे कि हमारा प्यारा भारत देश अपनी कुल पेट्रोलियम और अन्य ऊर्जा आवश्यकताओं का करीब 85 फीसदी आयात करता है। बात प्राकृतिक गैस की करें तो इस मामले में भी भारत की आधी से अधिक आवश्यकता विदेश से होने वाली गैस आपूर्ति से पूरी होती हैं।

दोस्तों, आपको बता दें कि भारत अक्षय ऊर्जा भंडार को देखते हुए हरित हाइड्रोजन अर्थ व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है। देश के 175 GW के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को केंद्रीय बजट 2022 से बढ़ावा देने की कोशिश की गई है। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा विकास और नेशनल हाइड्रोजन मिशन के लिये 1500 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं।

हाइड्रोजन का उपयोग न केवल भारत को पेरिस समझौते के तहत अपने उत्सर्जन लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता करेगा, बल्कि यह जीवाश्म ईंधन के आयात पर भारत की निर्भरता को भी कम करेगा।

हाइड्रोजन नीति बनाने में जापान और कोरिया सबसे आगे

दोस्तों, आपको बता दें कि अन्य देशों की तुलना में जापान और दक्षिण कोरिया हाइड्रोजन नीति बनाने के मामले में सबसे आगे हैं। लगभग तीन साल पहले यानी वर्ष 2017 में जापान ने बुनियादी हाइड्रोजन रणनीति तैयार कर ली थी, जो इस दिशा में वर्ष 2030 तक उसकी कार्ययोजना का ब्लू प्रिंट है। उसने इंटरनेशनल सप्लाई का पूरा खाका तैयार किया है।

वहीं, दक्षिण कोरिया ने अपने यहां ‘हाइड्रोजन अर्थव्यवस्था विकास और हाइड्रोजन का सुरक्षित प्रबंधन अधिनियम, 2020’ लागू किया है। इसी के तहत वह हाइड्रोजन से जुड़े प्रोजेक्ट तथा हाइड्रोजन फ्यूल सेल (Hydrogen Fuel Cell) की प्रोडक्शन यूनिट्स चला रहा है। इसके अलावा दक्षिण कोरिया ने ‘हाइड्रोजन का आर्थिक संवर्द्धन और सुरक्षा नियंत्रण अधिनियम’ भी लागू किया है। यह एक्ट हाइड्रोजन वाहन, चार्जिंग स्टेशन और फ्यूल सेल से संबंधित है।

हाइड्रोजन के मामले में भारत की स्थिति क्या है?

मित्रों, आपकी जानकारी के लिए बता दें कि भारत को अपनी अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों और प्रचुर प्राकृतिक तत्त्वों की मौजूदगी के चलते ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन में अपर हैंड रखता है। केंद्र सरकार ने पूरे देश में गैस पाइपलाइन के बुनियादी ढांचे को मजबूत किया है। वह स्मार्ट ग्रिड की शुरुआत सहित पावर ग्रिड के सुधार के लिए प्रस्ताव भी लाई है। नवीकरणीय ऊर्जा को प्रभावी ढंग से इंटीग्रेटे करने के लिये इस तरह के कदम उठाए जा रहे हैं।

अक्षय ऊर्जा उत्पादन, भंडारण और संचरण के जरिए भारत में हरित हाइड्रोजन का उत्पादन cost effective हो सकता है। इससे ऊर्जा सुरक्षा की भी गारंटी मिलेगी। लेकिन उद्योगों के व्यावसायिक रूप से हाइड्रोजन का इस्तेमाल करने में कई चुनौती हैं। इनमें सबसे बड़ी हरित अथवा ब्लू हाइड्रोजन से जुड़ी आर्थिक वहनीयता सबसे बड़ी चुनौती है।

आपको बता दें कि हाइड्रोजन के उत्पादन और दोहन में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकें जैसे-कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (CCS) तथा हाइड्रोजन फ्यूल सेल टेक्नोलॉजी आदि अभी शुरुआती दौर में हैं। साथ ही ये महँगी भी हैं, जिससे हाइड्रोजन की उत्पादन लागत यानी production cost बढ़ जाती है। एक प्लांट के पूरा होने के बाद फ्यूल सेल के मेंटिनेंस की लागत काफी ज्यादा हो सकती है। इसके अतिरिक्त ईंधन के रूप में तथा उद्योगों में हाइड्रोजन के कामर्शियल यूज के रिसर्च, डेवलपमेंट, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, उत्पादन से जुड़ी टेक्नोलॉजी और बुनियादी ढाँचे में काफी अधिक investment की जरूरत होगी।

भारत अवसर का बेहतर लाभ कैसे उठा सकता है?

वर्तमान में भारत हाइड्रोजन उत्पादन के नजरिए से एक समायोजित दृष्टिकोण के साथ रिसर्च एवं डैवलपमेंट के क्षेत्र में निवेश को बढ़ाने, क्षमता निर्माण, संगत कानून तथा अपनी विशाल आबादी के बीच मांग पैदा कर इस अवसर का लाभ बेहतरीन तरीके से उठा सकता है । यह कदम भारत की जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को बेहद कम कर सकता है। उसे पड़ोसी मुल्कों के साथ ही अन्य देशों के साथ हाइड्रोजन निर्यात का एक बड़ा केंद्र बना सकता है।

नेशनल हाइड्रोजन मिशन से जुड़े सवाल जवाब –

नेशनल हाइड्रोजन मिशन की घोषणा कब और किसने की है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2021 को स्वतंत्रता दिवस के दिन नेशनल हाइड्रोजन मिशन की घोषणा की है।

क्या इससे पहले भी इस संबंध में प्रस्ताव आया है?

जी हां, देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस संबंध में आम बजट 2022 के तहत प्रस्ताव ला चुकी हैं।

नेशनल हाइड्रोजन मिशन क्या है?

इस मिशन के तहत केंद्र सरकार की ओर से भारत आजादी की 100वीं वर्षगांठ यानी 2047 तक एक ऊर्जा संपन्न राष्ट्र बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

हाइड्रोजन नीति निर्माण में कौन से देश सबसे आगे हैं?

इस मामले में जापान और कोरिया सबसे आगे हैं।

ग्रीन हाइड्रोजन का सबसे बड़ा फायदा क्या है?

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे प्रदूषण से मुक्ति मिलेगी और पर्यावरण का संरक्षण होगा। जलवायु परिवर्तन के खतरे से निपटना संभव होगा।

दोस्तों, यह थी नेशनल हाइड्रोजन मिशन क्या है? घोषणा, उद्देश्य, लाभ से जुड़ी सारी जानकारी। उम्मीद है कि यह पोस्ट आपके लिए उपयोगी साबित होगी। यदि ऐसे ही किसी रोचक विषय पर आप हमसे जानकारी चाहते हैं तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में कमेंट करके हम तक अपनी बात पहुंचा सकते हैं। ।।धन्यवाद।।

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