एमएसपी कानून क्या है? MSP कैसे निर्धारित करतें हैं? MSP Rate 2022

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देश भर में इन दिनों कृषि [agriculture, farming, husbandry] कानून बेहद चर्चा में हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विवादित तीन कृषि कानून वापस लेने की घोषणा कर दी है। उन्होंने कहा कि वे इन बिलों के बारे में किसानों को समझा नहीं पाए। अलबत्ता, वेस्ट यूपी के किसान नेता राकेश टिकैत ने एमएसपी (MSP) की गारंटी पर कानून बनने के बाद ही आंदोलन को समाप्त करने की घोषणा की है।

इन दिनों तमाम मुद्दों के बीच एमएसपी भी लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। क्या आप जानते हैं एमएसपी की फुल फाॅर्म क्या है? इसका अर्थ क्या है? किसान बिल में एमएसपी को लेकर चर्चा क्यों गरम है? यदि आप नहीं जानते तो भी कोई बात नहीं। आज इस पोस्ट में हम आपको एमएसपी के बारे में वह सब कुछ बताएंगे, जो आपको जानना जरूरी है। आपको बस करना यह है कि इस पोस्ट को ध्यान से अंत तक पढ़ते जाना है। आइए, शुरू करते हैं-

एमएसपी क्या है? [What is MSP?]

दोस्तों, आपको बता दें कि एमएसपी की फुल फाॅर्म है-मिनिमम सपोर्ट प्राइस (minimum support price) यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य। मित्रों, यह वह न्यूनतम मूल्य है, जिस पर सरकार किसानों से उनकी फसल खरीदती है। न्यूनतम अर्थात सबसे कम। यानी किसान से खरीदे जाने वाली फसल पर उसे एमएसपी से कम भुगतान नहीं होगा।

एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य क्या है? MSP कैसे निर्धारित करतें हैं? MSP Rate 2022

कुल मिलाकर इससे किसानों को अपनी फसल बेचने को एक आधार मूल्य मिल जाता है। उसका भुगतान उन्हें हर स्थिति में होता है। चाहे बाजार मूल्य उससे भी कम क्यों न हों। सरकार किसानों से अपनी खरीद एमएसपी पर ही करती है। इसका उसने एक सिस्टम विकसित किया हुआ है।

एमएसपी डिटेल्स इन हिंदी

योजना का नामएमएसपी – न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना
एमएसपी कौन देता हैकेंद्र सरकार या राज्य सरकार
किसे लाभ मिलेगादेश के किसानों को
एमएसपी की फुल फॉर्मMinimum Support Price (न्यूनतम समर्थन मूल्य)
उद्देश्यकिसानों को निर्धारित आय प्रदान करना
लाभफसलों के उतार-चढ़ाव में किसानों पर कोई असर नहीं पड़ेगा
एमएसपी का आरम्भ वर्ष1966-67
एमएसपी किसके द्वारा तय की जाती हैकृषि लागत एवं मूल्य आयोग

एमएसपी को तय करने की क्या वजह है?

मित्रों, एमएसपी को तय करने की यह वजह है कि किसानों को किसी भी स्थिति में उनकी फसल के लिए एक वाजिब अथवा उचित न्यूनतम मूल्य मिले। किसानों की ओर से महंगाई एवं खेती करने की लागत बढ़ने के चलते मुनाफा घटने की बात कहते हुए एमएसपी बढ़ाने की मांग की जाती रही है।

अलबत्ता, सरकार उनकी मांगती भी है, लेकिन इसमें उतनी बढ़ोत्तरी नहीं होती, जितनी किसानों की मांग होती है। इस पर किसान अक्सर आंदोलित रहते हैं।

देश में एमएसपी का प्रावधान कब से शुरू हुआ?

मित्रों, अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि हमारे देश भारत में एमएसपी का प्रावधान कब से शुरू हुआ? आपको जानकारी दे दें कि आज से 56 साल पहले यानी सन 1965 में हरित क्रांति (green revolution) के वक्त एमएसपी की घोषणा की गई। गेहूं की खरीद के समय सन 1966-67 में इसका आगाज हुआ। बाद में इससे चावल यानी धान के साथ ही कुल 23 फसलों का नाम जुड़ गया।

सरकार फसल क्यों खरीदती है?

यह एक अहम सवाल है। दोस्तों, आपको बता दें कि राशन सिस्टम (ration system) के अंतर्गत जरूरतमंदों को वाजिब दरों पर अनाज प्रदान करने के लिए सरकार किसानों से विभिन्न एजेंसियों के माध्यम से फसल खरीदती है। इसके अतिरिक्त सरकार की ओर से अनाज एवं दालों का बफर स्टॉक (buffer stock) भी बनाया जाता है, जिससे बाजार में कीमत बेहद अधिक बढ़ने अथवा अकाल/ बाढ़ जैसी स्थिति में सरकार अनाज खुले बाजार में भेज सके एवं कीमतों पर काबू कर सके।

सरकारी खरीद के बाद अनाज एफसीआई (FCI) एवं नैफेड (NAFED) के पास जमा होता है। इसका उपयोग सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public distribution system) यानी पीडीएस (PDS) के लिए होता है।

एमएसपी कौन तय करता है?

साथियों, आपके मन में एक प्रश्न अवश्य उठ रहा होगा कि आखिर यह एमएसपी कौन तय करता है? सरकार अथवा कोई और? तो आपको बता दें कि गन्ने का न्यूनतम समर्थन मूल्य गन्ना आयोग (sugarcane commission) तय करता है।

वहीं, कृषि लागत एवं मूल्य आयोग यानी कमीशन फाॅर एग्रीकल्चर काॅस्ट एंड प्राइस (commission for agriculture cost and price) सीएसीपी (CACP) की सिफारिश पर साल में दो बार रबी एवं खरीफ की फसल के मौसम में सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा करती है। इसके पास 2009 यानी 12 वर्ष से यह जिम्मेदारी है।

एमएसपी कैसे तय होता है?

यह एक बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न है, जो हर किसी के दिमाग को मथता है। दोस्तों, यह तो हमने आपको बताया कि सीएसीपी फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की सिफारिश करता है। लेकिन इसके आधार क्या होते हैं? दोस्तों इसके कई आधार होते हैं एवं न्यूनतम समर्थन मूल्य को कई तरह के फैक्टर प्रभावित करते हैं, जो कि इस प्रकार से हैं-

  • फसल की लागत।
  • फसल की मांग एवं आपूर्ति की स्थिति।
  • घरेलू एवं वैश्विक बाजार मूल्य ट्रेंड।
  • अन्य फसलों से तुलना।
  • उपभोक्ता पर एमएसपी की बढ़त से होने वाला असर।
  • उपभोक्ताओं पर महंगाई का प्रभाव।
  • पर्यावरण पर मिटृटी एवं पानी के इस्तेमाल का प्रभाव।
  • कृषि एवं गैर कृषि क्षेत्र के उत्पादों के बीच कारोबारी शर्तें।
  • इन तमाम बातों पर अध्ययन करने के बाद ही किसी फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोशणा की जाती है।

सीएसीपी उत्पादन लागत का आंकलन कैसे करती है?

साथियों, अब हम आपको बताएंगे कि सीएसीपी उत्पादन लागत का अनुमान कैसे लगाती है। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार से है-

A2- इसके अंतर्गत वह किसान द्वारा बीज, उर्वरक, कीटनाशक, श्रम, पट्रटे पर ली गई जमीन, ईंधन, सिंचाई आदि पर किए गए प्रत्यक्ष खर्च को शामिल करती है।

A2 + FL- इसके अंतर्गत A2 के साथ ही अवैतनिक पारिवारिक श्रम का एक अनुमानित मूल्य शामिल किया जाता है।

C2- यह एक व्यापक लागत है, जिसके अंतर्गत A2+FL में किसान की स्वामित्व वाली जमीन एवं अचल संपत्ति (non moving property) के किराये (rent) तथा ब्याज (interest) को भी शामिल कर लिया जाता है।

स्वामीनाथन आयोग का गठन कब हुआ था?

दोस्तों, आपको बता दें कि आज से करीब 17 साल पहले यानी 2004 में एमएसपी पर सुझाव देने को स्वामीनाथन आयोग (swaminathan commission) का गठन किया गया था। उसने एमएसपी के औसत उत्पादन लागत (average production cost) से कम से कम 50 फीसदी अधिक होने की सिफारिश की थी।

वर्तमान केंद्र सरकार ने एमएसपी को उत्पादन लागत का कम से कम डेढ़ गुना करने की घोषणा की है। बावजूद इसके एमएसपी को लेकर किसान संतुष्ट नहीं। वजह यह है कि जो भी एमएसपी सरकार घोषित करती है, वह कृषि लागत को ध्यान में रखते हुए मामूली लगती है।

खास तौर पर खेत जुताई के लिए इस्तेमाल होने वाले ट्रैक्टरों, सिंचाई के पंपों, हार्वेस्टर कंबाइन (harvestor combine) के लिए इस्तेमाल होने वाले डीजल की कीमतों में इजाफा होने से खेती की लागत बढ़ी है।

सरकार कितनी फसलों के लिए एमएसपी घोषित करती है?

यह एक बेहद महत्वपूर्ण जानकारी है। आपको बता दें कि सरकार कुल 23 फसलों के लिए एमएसपी तय करती है। इनमें सात फसलें अनाज की, पांच दलहन की, सात तिलहन की एवं चार व्यावसायिक फसलें शामिल हैं।

एक नजर में देखें तो गेहूं, मक्का, जौ, धान, चना, बाजरा, मूंग, तुअर, उड़द, सरसों, मसूर, सूरजमुखी, सोयाबीन, गन्ना, जूट, कपास आदि की एमएसपी सरकार घोषित करती है।

सब्जियों की एमसएपी तय करने वाला केरल पहला राज्य

आपको यह जानकारी खुश कर सकती है। आपको बता दें कि साक्षरता में टाॅप पर रहने वाला केरल (Kerala) राज्य सब्जियों की एमएसपी तय करने वाला भी पहला राज्य बन गया है। यहां 16 तरह की सब्जियों को इस दायरे में रखा गया है। एमएसपी को आप आधार मूल्य यानी बेस प्राइस (base price) भी पुकार सकते हैं। केरल में सब्जियों का एमसएपी उत्पादन लागत से 20 प्रतिशत अधिक तय किया गया है।

आपको बता दें कि अब हरियाणा (haryana) राज्य भी इस दिशा में कदम आगे बढ़ा रहा है। वहां भी सब्जियों का एमएसपी तय करने के लिए खेती से जुड़े तमाम पक्षों से सुझाव मांगे जा रहे हैं। इसके अलावा प्रदेश में मंडियों का सर्वे (survey) कराया जा रहा है।

वर्तमान में किसान एमएसपी को लेकर खौफजदा क्यों हैं?

इन दिनों यह चर्चा बहुत से लोगों की जुबान पर है। यह बात अलग है कि बहुत सारे लोग कृषि कानून बिलों के बारे में अधिक कुछ नहीं जानते। आपको बता दें कि सरकार ने जिन तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोशणा की है, उनमें से एक किसान उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा विधेयक)-2020 का मकसद विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं द्वारा गठित कृषि उपज विपणन समितियों यानी एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (agriculture produce marketing committee) या यूं कह लीजिए कि एपीएमसी (APMC) द्वारा विनियमित मंडियों के बाहर कृषि उपज की बिक्री की इजाजत देना था।

सरकार का कहना था कि किसान का कानून के माध्यम से एपीएमसी की मंडियों के बाहर भी अपनी उपज को ऊंचे दामों में बेच सकते हैं। ऐसे में वे निजी खरीदारों से बेहतर दाम प्राप्त कर सकते हैं। इसमें कहीं भी एमएसपी का जिक्र नहीं है। ऐसे में किसानों के भीतर एमएसपी खत्म होने का डर व्याप्त है।

उनका कहना है कि सरकार ने यह कदम बड़े बड़े कारपोरेट (corporate) खरीदारों को खुली छूट देने के मकसद से उठाया है। वे बगैर किसी रजिस्ट्रेशन (registration) एवं बगैर किसी कानून के दायरे में आए किसानों की उपज खरीदेंगे एवं बेचेंगे। अब सरकार द्वारा बिल वापस लेने की घोषणा के बावजूद किसानों को इस बात पर भरोसा नहीं हो रहा।

वे चाहते हैं कि एक विधेयक के जरिए किसानों को लिखित में एमएसपी को लेकर आश्वासन दिया जाए। यही वजह है कि उन्होंने अभी आंदोलन की समाप्ति से इन्कार किया है। उनके भीतर एक डर और है। वो ये कि सीएसीपी एमएसपी की सिफारिश करती है, लेकिन यह संसद के एक्ट के जरिये स्थापित किया कोई वैधानिक निकाय नहीं है।

प्राइस फिक्सिंग (price fixing) यानी मूल्य तय होने न होने एवं प्रवर्तन (enforcement) पर फैसले का अधिकार सरकार के ही पास है। सरकार फसलों के लिए एमएसपी घोषित करती है, लेकिन कार्यान्वयन को आवश्यक बनाने संबंधी कोई कानून नहीं। सरकार चाहे तो एमएसपी पर खरीद कर सकती है, लेकिन इस संबंध में उसकी कोई कानूनी मजबूरी नहीं है।

बहुत से किसान एमएएसपी देखकर ही करते हैं बुआई

दोस्तों, आपको बता दें कि हर वर्ष खेतों में फसल की बुआई से पहले फसलों का एमएसपी तय हो जाता है। यहां तक कि बहुत से किसान तो एमएसपी देखकर ही फसल की बुआई करते हैं।

एमएसपी के साथ दिक्कतें क्या हैं?

एमएसपी के साथ मुख्य दिक्कत यह है कि गेहूं एवं चावल को छोड़ दें ताकि बाकी फसलों की खरीद के लिए सरकार के पास मशीनरी, संसाधनों की कमी है। गेहूं एवं चावल को भारतीय खाद्य निगम यानी फूड कारपोरेशन आफ इंडिया (food corporation of India) सार्वजनिक वितरण प्रणाली (public distribution system) सिस्टम यानी पीडीएस (PDS) के तहत अंतर्गत सक्रिय रूप से खरीदता है।

एक दिक्कत यह भी है कि जिन राज्यों में सरकारें संपूर्ण अनाज खरीदती हैं, वहां के किसानों को अधिकतम लाभ की प्राप्ति होती है, वहीं कम खरीद वाले राज्यों के किसान नुकसान में रहते हैं। तीसरे एमएसपी खरीद प्रणाली बिचौलियों, कमीशन एजेंटों (commission agents) एवं एपीएमसी अधिकारियों पर भी निर्भर है, जिससे छोटे किसान तक लाभ मुश्किल से पहुंचता है।

एमएसपी पर प्रधानमंत्री ने समिति बनाने का ऐलान किया है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि कानून वापस लेने की घोषणा करने के बाद अगला कदम उठाते हुए एमएसपी पर समिति (committee) बनाने का ऐलान किया है। उनके इस कदम को वर्तमान में कृषि कानूनों की वापसी के संदर्भ में देखा जा सकता है। इस कमेंटी में केंद्र एवं राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों के साथ ही किसान कृषि वैज्ञानिक एवं कृषि अर्थशास्त्री शामिल होंगे।

प्रधानमंत्री के मुताबिक उनका मकसद एमएसपी को और प्रभावी एवं पारदर्शी बनाना है। साथ ही एमएसपी से जुड़े विषयों पर भी उनकी निगाह भविष्य पर लगी है। उन्होंने इस संबंध में ट्वीट (tweet) के माध्यम से भी जानकारी दी। विशेषज्ञ मानते हैं कि कमेटी के फैसलों पर ही एमएसपी तय होगी। इसके साथ ही सरकार किसानों की आय बढ़ाने के लिए और कदम उठा सकती है।

आपको बता दें कि सरकार ने 2022 तक पहले ही किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य अपने लिए निर्धारित किया हुआ है। इसी संबंध में वह जीरो बजट प्राकृतिक खेती (zero budget natural farming) के इस्तेमाल के लिए भी लोगों को जागरूक करने में लगी हुई है। इसके साथ ही वह इसके लिए सहायता भी मुहैया करा रही है। इसमें विशेषज्ञ एवं तकनीकी सहायता (technical assistance) भी शामिल है, जिसके लिए उसने अलग से बजट भी मुहैया कराया है।

एमएसपी जैसे मसलों को समाहित करते हुए किसान बिल कब आया

मित्रों, आपको बता दें कि कोरोना काल के दौरान ही सरकार तीनों कृषि बिलों को लाई थी। पांच जून, 2020 को मोदी सरकार इन बिलों को अध्यादेश के जरिए लेकर आई। इसके पश्चात 14 सितंबर, 2020 को केंद्र ने इन अध्यादेशों को संसद (parliament) में पेश किया। 17 सितंबर, 2020 को यह बिल संसद लोकसभा को पारित हो गए।

अलबत्ता, विपक्षी दलों ने इस बीच सदन को सिर पर उठाए रखा। किसान विरोधी बताते हुए इन बिलों का जबरदस्त विरोध किया। इसके बावजूद बिल पास होकर रहे। इसके पश्चात 20 सितंबर, 2020 को ये बिल उच्च सदन राज्यसभा में लाए गए। यहां भी इन्हें विरोध का सामना करना पड़ा, किंतु ये अंततः पास हो गए। 27 सितंबर, 2020 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (president ramnath kovind) के इन बिलों का मंजूरी देने के साथ ही इन्होंने कानून की शक्ल ले ली।

किसान साल भर से अधिक समय से विरोध कर रहे थे

किसान कृषि कानूनों का साल भर से भी अधिक समय से विरोध कर रहे थे। केंद्र सरकार का कहना था कि वह इन बिलों को किसानों के हालात सुधारने के लिए लाई है, लेकिन उसका लाने का तरीका एकतरफा था। किसान भी इस बिल के मसौदों से संतुष्ट नहीं थे। बिल लाने से पहले उन्हें विश्वास में नहीं लिया गया।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश (west up), पंजाब (punjab), हरियाणा (haryana) समेत कई राज्यों के किसान इन कानूनों के खिलाफ उतर आए। 25 सितंबर, 2020 को पहली बार कृषि बिलों को लेकर किसान संगठनों ने जबरदस्त विरोध जताना शुरू किया। किसान संघर्ष समन्वय समिति ने राष्ट्रव्यापी विरोध का ऐलान किया। इस बीच दिल्ली के टीकरी समेत अन्य बार्डर पर किसानों का भारी जमाव हो गया।

ऐसा नहीं कि इस बीच सिर्फ धरने, प्रदर्शन ही हुए। किसानों एवं सरकार के प्रतिनिधियों के बीच कई बार बैठक हुई। दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी बात रखी, लेकिन मामला सुलझा नहीं। किसान तीनों कानून वापस लिए जाने की मांग कर रहे थे एवं वे उसपे अड़े रहे। आंदोलन के इस क्रम में आस पास रहने वाले लोगों को बहुत परेशानियां झेलनी पड़ीं।

रास्ता ब्लाॅक हो गया। उन्हें अपने आफिस तक जाने में जहां पहले 15 मिनट लगते थे, घूमकर जाने में डेढ़ घंटा लगने लगा, लेकिन आंदोलन पर इसका असर नहीं पड़ा। वहीं आंदोलन कर रहे करीब 700 किसानों की जानें किसी न किसी वजह से चली गईं। इसके बावजूद किसान अड़े रहे, डटे रहे।

एमएसपी को लेकर पंजाब, हरियाणा के किसान अधिक मुखर क्यों

इस बात पर आपने भी गौर किया होगा कि एमएसपी के मसले पर पंजाब एवं हरियाणा राज्यों के किसान अधिक मुखर रहे हैं। आखिर इसकी क्या वजह है? दोस्तों आपको बता दें कि इन दो राज्यों के किसानों की खुशहाली के पार्श्व में एमएसपी का बड़ा हाथ रहा है।

यह एक सच है कि इस व्यवस्था का प्रावधान पंजाब एवं हरियाणा में गेहूं तथा धान के उत्पादन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हुई थी। दरअसल, केंद्र सरकार खाद्य एवं सुरक्षा अधिनियम यानी फूड एंड सिक्योरिटी एक्ट (food and security act) के अंतर्गत पंजाब एवं हरियाणा से चावल एवं गेहूं का भंडार जुटाती है।

इस गेहूं, चावल को उत्तर प्रदेश, बिहार ओड़िशा आदि राज्यों के निर्धन लोगों तक पीडीएस के अंतर्गत पांच रूपये प्रति किलो के बेहद कम मूल्य पर उपलब्ध कराया जाता है।

देश के केवल पांच प्रतिशत ही किसानों को एमएसपी का लाभ मिल रहा

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि देश के केवल पांच प्रतिशत ही किसानों को एमएसपी का लाभ मिल पा रहा है। दरअसल, यही वे किसान हैं, जो उन राज्यों से ताल्लुक रखते हैं, जहां हरित क्रांति का इतिहास रहा है।

यहां एक एमएसपी सिस्टम बना हुआ है। बाकी 95 किसान सिस्टम के दायरे में आ ही नहीं सके। इसकी कुछ वजहें इस प्रकार से हैं-

  • किसानों में जागरूकता की कमी।
  • खेतों का अपर्याप्त आकार।
  • एपीएमसी मंडियों को लेकर अरूचि।

कौन से किसान एमएसपी के दायरे से बाहर?

मित्रों, आपको बता दें कि औसतन दो हेक्टेयर से भी कम जमीन वाले किसान एमएसपी के दायरे से बाहर हैं। इसके अलावा इस दायरे में वे किसान भी शामिल हैं, जिनके पास अपनी खेती की जमीन नहीं है। आपको बता दें कि हाशिए के इन किसानों की संख्या करीब 86 प्रतिशत है। ये किसान अपनी लागत का ठीक से रिटर्न (return) तक नहीं पाते।

ये न तो सरप्लस अनाज ही उगा पाते हैं एवं न ही इनके पास ट्रांसपोर्ट आदि के पर्याप्त साधन हैं और न ही इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) है। इस प्रकार कुछ प्रदेशों में किसान एमएसपी से समृद्ध होते हैं। लेकिन जो राज्य समृद्ध नहीं होते, वहां के किसानों पर सिस्टम का बोझ बढ़ जाता है।

2021-22 के लिए एमएसपी क्या है?

साथियों, अब आपको बताते हैं कि 2021-22 के लिए सरकार ने किन फसलों के लिए कितना एमएसपी घोषित किया। रबी की एवं खरीफ की फसलों के अनुसार इसकी जानकारी इस प्रकार से है-

फसलएमएसपी 2021-22बढ़ोतरीलागत मूल्य पर लाभ
धान (सामान्य)1940 रुपए7250 प्रतिशत
धान (ग्रेड ए)1960 रुपए7252 प्रतिशत
ज्वार (हाइब्रिड)  2738 रुपए11850 प्रतिशत
ज्वार (मलडंडी)        2758 रुपए11851 प्रतिशत
बाजरा2250 रुपए10085 प्रतिशत
रागी3377 रुपए82 50 प्रतिशत
मक्का1870 रुपए2050 प्रतिशत
तुअर (अरहर)6300 रुपए30062 प्रतिशत
मूंग7275 रुपए7950 प्रतिशत
उड़द6300 रुपए30062 प्रतिशत
मूंगफली5550 रुपए27550 प्रतिशत
सूरजमुखी के बीज6015 रुपए 13050 प्रतिशत
सोयाबीन (पीली)3950 रुपए7050 प्रतिशत 
तिल7307 रुपए45250 प्रतिशत
नाइजरसीड (रामतिल)6930 रुपए23550 प्रतिशत
कपास (मध्यम रेशा)5726 रुपए21150 प्रतिशत
कपास (लंबा रेशा)6025 रुपए20058 प्रतिशत

चुनाव एवं एमएसपी का अटूट संबंध

उत्तर प्रदेश हो, हरियाणा अथवा पंजाब समेत कोई दूसरा राज्य। एमएसपी का चुनाव से अटूट संबंध है। चुनाव मैदान में राजनीतिक पार्टियां अपने घोषणा पत्रों में किसान वर्ग को बहलाने के लिए एमएसपी की बढ़ोत्तरी का वादा जरूर करती हैं। हालांकि यह बात दीगर है कि अन्नदाताओं को उनसे किए वादे के मुताबिक शायद ही एमएसपी कभी मिल पाती है।

एमएसपी का चुनाव से संबंध इसी बात से समझ सकते हैं कि साल भर से किसानों को कृशि कानून के लाभ समझाने वाले केंद्र सरकार चुनाव का वक्त नजदीक आते ही बैकफुट पर आ गई। इसको यह बात निश्चित रूप से खटक रही थी कि इस मुद्दे पर किसानों का वोट उसके हाथ से निकल सकता है।

विपक्ष ने इस कदम को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आड़े हाथों लिया। वे सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल भी होते रहे। हाल ही में पद्मश्री पुरस्कार पाईं अभिनेत्री कंगना रानौत तक ने इसे गलत बताया। इसके अलावा कई मीडिया के बड़े लोग भी इस पैर पीछे खींचने को कदम को गलत बताते रहे।

अलबत्ता, उसके पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता यह बात कहने से नहीं चूक रहे कि कृषि कानूनों को वापस लेकर मोदी जी ने मास्टर स्ट्रोक लगाया है। उन्होंने विपक्ष से किसानों का मुद्दा छीनकर उसे मुद्दा विहीन कर दिया है। उनका कहना है कि इसका असर चुनावों में अवश्य दिखेगा। अब यह तो भविष्य के गर्भ में है कि इस मुद्रदे से वाकई किस तरह का असर वास्तव में पड़ेगा।

दोस्तों, हमने आपको इस पोस्ट के माध्यम से एमएसपी की जानकारी दी। उम्मीद है कि यह पोस्ट आपके लिए बेहद उपयोगी साबित होगी। कृषि में दिलचस्पी रखने वालों के साथ ही छात्रों के लिए भी न्यूनतम समर्थन मूल्य के विषय में जानकारी होना बेहद आवश्यक है। आप इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करें ताकि अधिक से अधिक लोग इसका लाभ उठाकर अपनी जानकारी में इजाफा कर सकें। इस पोस्ट को लेकर आपकी प्रतिक्रियाओं का हमें इंतजार है। ।।धन्यवाद।।

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