कालापानी क्या है? कालापानी की सजा कब दी जाती है? कालापानी जेल कहां है?

कालापानी की सजा का नाम सुनकर अच्छे अच्छों की रूह कांप जाती है। अगर आप कार्यालय में काम कर रहे हों तो आपने अपने बास या मुखिया से अक्सर यह शब्द सुने होंगे कि अगर अच्छा काम न किया तो काला पानी भेज देंगे। कई कर्मचारी भी ऐसे होंगे, जो नापसंद की जगह तैनाती को काला पानी करार देते होंगे। इससे एक बात स्पष्ट है कि काला पानी की सजा अर्थात मुश्किल सजा, मुश्किल स्थान। दरअसल कालापानी शब्द ही खौफ का पर्याय है वह इसलिए क्योंकि कालापानी की सजा को बेहद खौफनाक माना जाता था।

दोस्तों, क्या आप जानते हैं कि काला पानी की सजा क्या होती है? यह कब दी जाती थी? अगर नहीं जानते हैं तो भी चिंता की कोई बात नहीं आइए हम आपको बताते हैं कि कालापानी क्या है और इसकी सजा कब दी जाती थी और क्यों दी जाती थी। और साथ ही यह भी उसका अंग्रेजों से क्या नाता है। साथ ही, यह भी कि इसका हमारे देश की आजादी से क्या ताल्लुक है। इन सब बिंदुओं पर आज हम आपको इस पोस्ट के माध्यम से जानकारी देंगे। आइए जानते हैं-

काला पानी की सजा क्या है? कालापानी जेल कहां है?

दोस्तों, सेल्युलर जेल की सजा को काला पानी की सजा कहा जाता था। अब आपके दिमाग में सवाल आएगा कितनी ऐसा क्यों? तो ऐसा इसलिए दोस्तों, क्योंकि यह सेल्युलर जेल अर्थात कालापानी जेल भारत से हजारों किलोमीटर की दूरी पर आज के अंडमान निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर में बनी थी, जहां चारों ओर पानी ही पानी था। यहां मूल रूप से भारत की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को सजा देकर भेजा जाता था। बेड़ियों में जकड़कर रखा जाता था। चारों ओर समुद्र का पानी होने की वजह से कोई भी कैदी यहां से भागने में कामयाब नहीं हो पाता था। यह पूरा क्षेत्र बंगाल की खा़ड़ी के तहत आता था। यहां कैदियों को सामान्य जनों से दूर रखने का प्रावधान था और कड़ी यातनाएं दी जाती थीं।

माना जाता था कि जो भी जाएगा यहां से वापस नहीं आ पाएगा, लिहाजा इसे कालापानी की संज्ञा दी गई थी। 19वीं सदी में जब स्वतंत्रता संग्राम ने जोर पकड़ा तो इसके साथ ही कैदियों की संख्या भी यहां बढ़ती गई। यह भी बता दें कि इसे बनवाने का विचार अंग्रेजों को 1857 की क्रांति के बाद आया था। वह स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वालों को ऐसी जगह भेजना चाहते थे, जहां उनको घोर यातनाएं दी जा सकें और वह वहां से चाहने के बावजूद भाग न सकें। वह उनका हौसला तोड़ने की चाहत रखते थे।

क्या काम कराया जाता था कैदियों से –

यहां रहने वाले क्रांतिकारियों या यूं कह लीजिए कि कैदियों को घोर यातनाएं दी जाती थीं। उनको हथकड़ी, बेड़ियों में बांधकर रखा जाता था। उनसे हर रोज़ 30 पाउंड नारियल और सरसों का तेल पेरने का काम लिया जाता था। अगर कोई ऐसा न करता या यह काम लिए जाने का विरोध करता था तो बुरी तरह पीटा जाता था और बेड़ियों से जकड़ दिया जाता था।

कालापानी जेल को सेल्युलर जेल क्यों कहा गया –

कालापानी क्या है? कालापानी की सजा कब दी जाती है? कालापानी जेल कहां है?

इस जेल को सेल्युलर जेल इसलिए कहा जाता था, क्योंकि यहां हर कैदी को अलग सेल में रखा जाता था। यह जेल ऑक्टोपस की तरह सात शाखाओं में फैली थी। कैदियों को अलग अलग सेल में रखे जाने का मकसद यह था कि वह भारत की आजादी को लेकर किसी भी तरह की कोई योजना न बना सकें, साजिश न रच सकें। कैदियों को अकेले और अलग रखने का एक मकसद यह भी था कि कैदी अकेले रहते रहते अकेलेपन से इतने त्रस्त हो जाएं कि किसी भी तरह की बगावत की बात उनके दिमाग के भीतर भी न आए।

कब शुरू हुआ कालापानी जेल का निर्माण –

दोस्तों, आपको बता दें कि इस जेल का निर्माण कार्य 1896 में शुरू किया गया था। यह जेल 1906 में बनकर तैयार हो गई थी। यानी इसे बनाने में कुल 10 साल लगे। जैसा कि हम आपको ऊपर बता चुके हैं कि जेल के निर्माण का ख्याल अंग्रेज़ों के दिमाग में 1857 में आ चुका था, लेकिन उसे मूर्त्त रूप लेने यानी कि अमली जामा पहनने में करीब 40 साल का समय लग गया।

सबसे पहले कौन पहुंचा कालापानी जेल में –

काला पानी की सजा पर यानी सेल्युलर जेल में सबसे पहले 200 विद्रोहियों को लाया गया। उन्हें जेलर डेविड बेरी और मेजर जेम्स पेटीसन वॉकर की सुरक्षा में यहां लाया गया था। इसके बाद 733 विद्रोहियों को कराची, जो कि अब पाकिस्तान में है, से यहां लाया गया। न केवल भारत बल्कि बर्मा से भी यहां सेनानियों को सजा सुनाए जाने के बाद कैदी बनाकर यहां लाया गया था।

कितनी सेल थीं काला पानी की निशानी सेल्युलर जेल में –

दोस्तों, आपको बता दें कि कालापानी की निशानी सेल्युलर जेल में तीन मंजिल वाली कुल सात शाखाएं बनाई गई थीं। इस जेल में कुल 696 सेल थीं। हर सेल का साइज 4.5 गुना 2.7 मीटर था। इसमें कोई शयन कक्ष नहीं था। तीन मीटर की ऊंचाई पर खिड़कियां लगी हुई थीं। यानी अगर कोई कैदी जेल से निकलना चाहे तो वह आसानी से निकल सकता था, लेकिन जैसा कि हम पहले बता चुके हैं, दिक्कत यह थी कि जेल के चारों ओर पानी भरा होने की वजह से वह यहां से भाग नहीं सकता था।

कितनी लागत आई कालापानी जेल को बनाने में –

साथियों, एक मोटा मोटी अनुमान की बात करें तो उस वक्त इस जेल को बनाए जाने में करीब पांच लाख, 17 हजार रुपये की लागत आई थी। इसका मुख्य भवन लाल ईंटों से बना गया था। इसके साथ ही इस भवन में जो ईंटें लगी थीं, वह भारत की नहीं थीं, वह बर्मा से लाई गई थीं। लगे हाथ आपको यह जानकारी भी दे दें कि बर्मा को ही आज म्यांमार के नाम से जाना जाता है। अब लौटें जेल पर।

इस सेल्युलर जेल की सात शाखाओं के बीच में एक टावर लगा था। इस टावर से ही सब कैदियों पर नजर रखी जाती थी। आपको बताएं कि उस टावर के ऊपर एक घंटा भी लगाया जाता था, इसे उस वक्त बजाया जाता था, जब किसी भी तरह के खतरे का अंदेशा जेल प्रशासन को होता था।

क्या कभी कोई भाग सका काला पानी की सजा से?

दोस्तों, इस सवाल का जवाब न में है। इस जेल से कैदियों ने भागने की कोशिश जरूर की, लेकिन अपनी मंशा में कामयाब नहीं हो सके। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि एक बार यहां से 238 कैदियों ने भागने की कोशिश की थी। लेकिन उन्हें पकड़ लिया गया। एक कैदी ने तो आत्महत्या कर ली थी और बाकी सब पकड़े गए। जेल अधीक्षक वाकर ने उसी वक्त भागने के जुर्म में 87 लोगों को फांसी पर लटकाने का आदेश दे दिया था।

कब भेजे गए कैदी कालापानी जेल से?

साथियों, आपको यह भी जानकारी दे दें कि आज से करीब 90 साल पहले सन् 1930 में देश की आजादी की लड़ाई लड़ रहे क्रांतिकारी भगत सिंह के सहयोगी महावीर सिंह ने यहां अत्याचार के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू की थी। जेल प्रशासन उन पर सख्त हो गया। जेल के कर्मचारियों ने उन्हें जबरन दूध पिला दिया। दूध जैसे ही उनके पेट के भीतर गया, उनकी मौत हो गई। इसके बाद उनके शव पर एक पत्थर बांधकर उन्हें समुद्र में फेंक दिया गया।

अंग्रेजों के अमानवीय अत्याचर का विरोध करते हुए 1930 में ही यहां कैदियों ने भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। तब महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर ने इसमें हस्तक्षेप किया। नतीजा यह हुआ कि आज से लगभग 80 साल पहले 1937-38 में यहां से कैदियों को उनके देश भेज दिया गया।

कालापानी जेल से अंग्रेजों का कब्जा कब हटा –

दोस्तों, वह 1940 का दशक था। जापानी शासकों ने अंडमान पर 1942 में कब्जा किया और अंग्रेजों को वहां से मार भगा दिया। उस समय हालत यह थी कि इतिहास पलट चुका था। अंग्रेज कैदियों को सेल्युलर जेल में बंद कर दिया गया था। उस दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भी सेल्युलर जेल का दौरा किया। 7 में से 2 शाखाओं को जापानियों ने उसी समय नष्ट कर दिया था। द्वितीय विश्व युद्य खत्म होने के बाद 1945 में यहां फिर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया।

कालापानी जेल को राष्ट्रीय स्मारक कब घोषित किया गया –

दोस्तों, आपको बता दें कि भारत यानी अपने देश को आजादी मिलने के बाद इसकी दो और शाखाओं को ध्वस्त कर दिया गया। शेष बचीं तीन शाखाओं और टावर को 1969 में राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया। इससे ठीक छह साल पहले सन् 1963 में यहां गोविंद वल्लभ पंत अस्पताल खोला गया था। वर्तमान में यहां 500 बिस्तर वाला अस्पताल है। 40 डॉक्टर इस वक्त यहां सेवा दे रहे हैं।

कालापानी जेल संग्रहालय में क्या क्या है?

मित्रों, आपको यह भी जानकारी दे दें कि जेल की दीवारों पर वीर शहीदों के नाम भी लिखे हैं। यहां एक संग्रहालय भी है, जहां उन अस्त्रों को देखा जा सकता है, जिनसे अंग्रेजों की ओर से स्वतंत्रता सेनानियों पर अत्याचार किए गए। 10 मार्च, 2006 को सेल्युलर जेल का शताब्दी वर्ष समारोह मनाया गया था। इसमें यहां पर सजा काटने वाले क्रांतिकारियों को श्रद्वांजलि दी गई थी।

क्या कोई भी देख सकता अब कालापानी जेल –

जी हां, दोस्तों, अब कोई भी इस वक्त इस सेल्युलर जेल को देख सकता है। अब यह सबके लिए खुला यानी ओपन टू आल है। आइए, अब आपको इसकी टाइमिंग की जानकारी दे दें यानी कि आप कब इस सेल्युलर जेल और संग्रहालय का मुजाहिरा कर सकते हैं। दोस्तों, यह सुबह नौ बजे से दोपहर साढ़े 12 बजे तक खुला है। साथ ही सवा बजे से पौने पांच बजे तक यहां का भ्रमण किया जा सकता है। यह राष्ट्रीय छुट् टी, अवकाश को छोड़कर अन्य सभी दिन खुला रहता है।

क्या यहां कोई फीस भी लगती है –

जी हां दोस्तों, इस सवाल का जवाब हां में है। यहां घूमने के लिए प्रवेश शुल्क देना पड़ता है, जो कि केवल 30 रुपये है। अगर आप कैमरा ले जाकर फोटोग्राफी करना चाहते हैं तो कैमरे के साथ आपको दो सौ रुपये में प्रवेश मिल सकता है। वीडियो कैमरा ले जाने के लिए आपको एक हजार रुपये चुकाने होते हैं।

वहीं, अगर आप यहां फिल्म की शूटिंग करना चाहते हैं तो फिर फिल्म की शूटिंग के लिए 10 हजार रुपये हर रोज चार्ज किया जाता है, लेकिन इसके लिए पूर्व इजाजत ली जानी जरूरी होती है।

कालापानी जेल में कौन कौन स्वतंत्रता सेनानी रहे –

दोस्तों, ऐसे नामों की लंबी फेहरिस्त है, जिन्हें देश की आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने के लिए काला पानी की सजा सुनाई गई और सेल्युलर जेल भेजा गया। इनमें कई अन्य कैदी भी शामिल थे। प्रमुख नामों में शुमार था बटुकेश्वर दत्त, विनायक दामोदर सावरकर, बाबू राव सावरकर, सोहन सिंह, मौलाना अहमदउल्ला, मौवली अब्दुल रहीम सादिकपुरी, मौलाना फजल-ए-हक खैराबादी, एस चंद्र चटर्जी, डॉ. दीवान सिंह, योगेंद्र शुक्ला, वमन राव जोशी, गोपाल भाई परमानंद आदि का नाम।

बीते दिनों क्यों चर्चा में रहा काला पानी –

साथियों बीते दिनों काला पानी की बहुत चर्चा रही। वह इसलिए भी हुआ, क्योंकि देश में पिछले दिनों पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के वीर सावरकर संबंधी बयान पर बहुत क्रिया प्रतिक्रिया रही। बहस मुबाहिसा हुआ। वह सत्ता प्रतिष्ठान के निशाने पर भी रहे। उन्होंने बयान दिया था कि वह राहुल गांधी हैं, राहुल सावरकर नहीं। इसी के चलते कालापानी यानी सेल्यूलर जेल भी चर्चा में रही, क्योंकि वीर सावरकर की जिंदगी का कुछ हिस्सा सजा के तौर पर इसी जेल में रहते हुए बीता था।

काला पानी फ़िल्म भी शूट हुई यहां –

साथियों, आपको बता दें कि सेल्युलर जेल में ही 1996 में बनी मलयालम फिल्म कालापानी की शूटिंग भी हुई थी। इस फिल्म को समीक्षकों की बहुत सराहना मिली। कला प्रेमी दर्शकों ने भी इसे हाथों हाथ लिया।

दोस्तों, तो यह थी काला पानी की सजा से जुड़ी सारी जानकारी। जैसे कि काला पानी क्या है, यह सजा किसको दी जाती थी, क्यों दी जाती थी, जैसे बिंदुओं पर आधारित जानकारी। उम्मीद है कि आपको इस post में दी गई जानकारी पसंद आई होगी और आपको आपके हर सवाल का जवाब मिला होगा। इसके बावजूद अगर आपके दिमाग में कोई भी शक या शुबहा है तो आप नीचे लिखे comment box पर comment करके उसे क्लियर कर सकते हैं।

इसके अलावा यदि कोई अन्य सवाल आपके दिमाग में है तो उनका भी स्वागत है। उनके जवाब भी आप नीचे लिखे comment box में comment करके पा सकते हैं। इसके साथ ही आपके सुझावों का भी हमेशा की तरह हमारे पास स्वागत है। आप जो भी सुझाव देंगे उस पर अमल करने की पूरी कोशिश रहेगी। हमें आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार है। ।।धन्यवाद।।

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