GDP क्या है? Bharat Ki Vartman GDP Kitni Hai? GDP का फुल फॉर्म क्या है?

अगर आप अर्थशास्त्र या कॉमर्स के स्टूडेंट रहे हैं तब तो आपने GDP का नाम जरूर सुना होगा। और अगर इसके छात्र न भी रहे हों तो भी ये नाम आपके कानों तक जरुर पहुंचा होगा। पिछले दिनों आम लोगों से लेकर सोशल मीडिया तक पर GDP छाई रही है। तमाम facebook, twitter पोस्ट तक इसे आधार बनाकर लिखी गईं। खूब comment हुए। हमारे देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक इस GDP की वजह से विपक्ष के निशाने पर रहे हैं। आम जनता ने भी कई माध्यमों से अपनी नाराजगी जाहिर की है।

GDP क्या है? GDP का फुल फॉर्म क्या है? Bharat Ki GDP Kitni Hai 2019

लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये GDP आखिर क्या बला है? क्या कहा आपका जवाब न में है? तो कोई बात नहीं तो चलिए हम आज आपको GDP के बारे में A to Z जानकारी देंगे। आपको बस करना यह है कि इस पोस्ट को पूरा पढना है ताकि आप GDP को ठीक से समझ सकें।

यह है GDP की फुल फॉर्म –

सबसे पहले हम आपको बताएँगे कि GDP की फुल फॉर्म क्या है। तो GDP की फुल फॉर्म होती है- Gross Domestic Product। इसे हिंदी भाषा में सकल घरेलू उत्पाद भी पुकारा जाता है। नाम से आप समझ ही गए होंगे कि मामला देश की आर्थिक या यूँ कहिये कि financial स्थिति से जुड़ा है। कोई भी अर्थशास्त्र का विद्यार्थी चाहे वह किसी भी डिग्री को हासिल कर चुका हो, अगर देश के आर्थिक विकास की बात करेगा तो GDP से उसका वास्ता पड़ेगा ही पड़ेगा। और जब से सोशल मीडिया पर देश की आर्थिक विकास की दर में गिरावट का मुद्दा हॉट हुआ है तब से तो GDP शब्द बच्चे बच्चे की जुबान पर है।

GDP क्या है? GDP का सीधा सा मतलब यूँ जानिए –

हमने आपको GDP की फुल फॉर्म तो बता दी, लेकिन आपके मन में यह सवाल जरुर उठ रहा होगा कि GDP का सीधा सा मतलब है क्या? इससे होता क्या है और लोग इसके घटने पर सरकारों को कोसने क्यों लगते हैं। तो आपको बता दें कि GDP किसी भी देश की आर्थिक सेहत को नापने का एक जरिया है या पैमाना है। हमारे देश में जीडीपी की गणना हर तिमाही यानी तीन माह में की जाती है। जीडीपी का आंकड़ा अर्थव्यवस्था के प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में उत्पादन की वृद्धि दर पर आधारित होता है। इसके तहत तीन घटकों कृषि यानी agriculture, उद्योग मतलब कि industry और सेवा यानी कि service को रखा गया है,

इन क्षेत्रों में उत्पादन यानी production बढ़ने या घटने के औसत के आधार पर GDP दर तय होती है। मतलब कि production का औसत ज्यादा है तो GDP दर भी ज्यादा होगी। इसी से आर्थिक विकास का पैमाना निर्धारित होगा। इस तरह यह साफ़ है कि एक दी हुई समय सीमा में किसी देश में उत्पादित अंतिम माल और सेवाओं का बाजार मूल्य ही GDP कहलाता है। basically, यह देश के कुल उत्पादन को मापता है।

GDP दर को कैसे मापा जाता है –

जीडीपी दर को मापने के दो पैमाने हैं। एक है constant price या हिंदी में कहिये तो सतत मूल्य और दूसरा current price यानी वर्तमान मूल्य का। constant price के तहत उत्‍पादन की कीमत को महंगाई से जोड़कर देखा जाता है। उत्पादन की कीमत भी महंगाई के साथ साथ ही घटती बढ़ती रहती हैं। लिहाजा इसके तहत जीडीपी की दर और उत्‍पादन का मूल्‍य एक आधार वर्ष में उत्पादन की कीमत पर तय होता है। दूसरा पैमाना current price है, जिसमें उत्‍पादन वर्ष यानी production year की महंगाई दर शामिल होती है। constant price हमारे देश का सांख्यिकी डिपार्टमेंट उत्‍पादन और सेवाओं के मूल्‍यांकन के लिए एक आधार वर्ष यानी कि base year तय करता है। इस वर्ष के दौरान कीमतों को आधार बनाकर उत्‍पादन की कीमत और तुलनात्‍मक बढ़ोतरी दर तय की जाती है। यही constant price GDP है।

आपको बता दें कि ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि जीडीपी की दर को महंगाई से अलग रखकर सही ढ़ंग से मापा जा सके। वहीँ current price के आधार पर GDP के लिए उत्पादन मूल्‍य में महंगाई की दर को जोड़ना होता है। इससे हमें आर्थिक उत्‍पादन की मौजूदा कीमत हासिल हो जाती है। उम्मीद है कि आपको GDP क्या है, यह स्पष्ट हो गया होगा। अगर कोई भी संशय आपके मन में है तो उसे GDP को कैलकुलेट करने के फार्मूले से पोस्ट के अगले हिस्से में दूर करने की कोशिश करेंगे।

इस फार्मूले से भी निकली जा सकती है GDP –

GDP कोई केवल थ्योरी का ही मसला नहीं है , बल्कि इसके लिए एक फार्मूला भी नियत किया गया है। बड़े-बड़े अर्थशास्त्री और विशेषज्ञ भी जीडीपी की कैलकुलेशन करने के लिए इस फार्मूले का इस्तेमाल करते हैं। इसके लिए उन्हें कुछ आंकड़ों की जरुरत होती है। आंकडें कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र से जुड़े होते है, जो की उन्हें अपने भारत देश का सांख्यिकी विभाग मुहैय्या करता है। तो ये है GDP कैलकुलेट करने का फार्मूला एक नज़र में –

GDP= उपभोग+ कुल निवेश + सरकारी खर्च (निर्यात-आयात)

GDP कैलकुलेट करने का फार्मूला आप यूँ भी समझ सकते है –

GDP = Consumption + Investment + Government Expenditure + (Export−Import)। आपको बता दें कि देखने में आपको यह फार्मूला केवल चार लाइन का सरल फार्मूला लग रहा है, लेकिन उपभोग, निवेश और सरकारी खर्च के आंकड़ों से जुडी जो गणना होती है। वह बहुत जटिल होती है।

GDP में इजाफे के तीन प्रकार –

GDP तीन तरह की होती है। एक होती है वर्तमान। वर्तमान वृद्धि दर को मापते हुए केवल वर्तमान मूल्य को ध्यान में रखा जाता है। एक होती है nominal मतलब कि नाममात्र GDP वृद्धि। इसके तहत मूल्य परिवर्तन पर नाममात्र का ध्यान रहता है। और एक होती है real यानी वास्तविक GDP वृद्धि। इसमें मूल्य परिवर्तन पर पूरी तवज्जो रहती है। वास्तविक GDP वृद्धि की गणना करने से अर्थशास्त्रियों को यह निर्धारित करने में मदद मिलती है कि मुद्रा की क्रय क्षमता यानी purchasing power से अप्रभावित रहते हुए उत्पादन कम हुआ है या बढा है।

किसी भारतीय नें नहीं बल्कि अमेरिकी ने इस्तेमाल की थी GDP टर्म –

अर्थशास्त्र की किताबों में पूरा दिन मुंह गड़ाए रखने के बाद भी कई युवा GDP से जुड़े कई पहलू नहीं जानते। मसलन उन्हें इसके इतिहास, भूगोल का भी कुछ पता नहीं होता। कुछ तो बस बेसिक सिद्दांतों का रत्ता मारकर ही अपने आपको बड़ा ज्ञानी और विद्वान समझने लगते हैं। तो आज हम आपको इसके बारे में बताने के साथ ही इसके थोड़े ऐतिहासिक पहलू पर भी नज़र डाल लेते हैं।

जैसा कि आपको पता है कि अमेरिका के एक अर्थशास्त्री साइमन ने 1935-44 के दौरान GDP टर्म को इस्तेमाल किया था। ये वह समय था संसार भर की बैंकिंग संस्थाएं आर्थिक विकास का अनुमान लगाने के काम में जुटीं थी, और उनमे से ज्यादातर को इसके लिए कोई सही शब्द नहीं मिल पा रहा था। साइमन ने GDP को अमेरिकी कांग्रेस में परिभाषित किया, जिसके बाद IMF (आईएमएफ) यानी अंतरराष्ट्री मुद्रा कोष ने इस शब्द को इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।

भाई साहब, जीडीपी का जीवन स्तर से लेना देना नहीं –

GDP को लेकर आम लोगों में कई बार बड़ी भ्रान्ति होती है। वह इसे एक इकॉनमी में लोगों के जीवन स्तर से जोड़कर देखते हैं। जबकि ऐसा है ही नहीं। दरअसल, प्रति व्यक्ति GDP (सकल घरेलू उत्पाद) उसका माप नहीं है। हालांकि, यह जरूर है कि अक्सर इसे इसके एक संकेतक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसके पीछे तर्क देश के सभी नागरिकों का अपने देश के बढे हुए आर्थिक उत्पादन का लाभ प्राप्त करने का होता है।

इसी प्रकार यह भी जान लीजिये कि GDP (सकल घरेलू उत्पाद) व्यक्तिगत आय का माप नहीं है। एक देश के ज्यादातर लोगों की आय में कमी आने पर या उसमें असमान बदलाव होने पर भी GDP में इजाफा हो सकता है। इस बात को आप अमेरिका के एक छोटे से उदाहरण से समझ सकते हैं –

वहां 1990 से 2006 के 16 साल के बीच निजी उद्योगों और सेवाओ में श्रमिकों की आय में हर साल 0.5% फीसदी का इजाफा हुआ, जबकि इसी अवधि GDP में 3.6% का हर साल इजाफा हुआ। इससे साफ़ पता चलता है कि आय में सुस्त रफ़्तार का GDP की ग्रोथ पर ज्यादा असर नहीं दिखा।

Bharat Ki GDP Kitni Hai 2019 –

यह है भारत की जीडीपी, जो बीते दिनों बेहद चर्चा में रही –

GDP बीते दिनों बेहद चर्चा में रही। भारत का Gross Domestic Product यानी सकल घरेलू उत्पाद मतलब कि GDP 2019-20 की पहली तिमाही में बीते साल की इसी अवधि की तुलना में लुढ़क गयी। अभी हाल में ही भारत की जीडीपी से जुड़े आंकड़े जारी किये गए हैं। जिसके अनुसार साल 2019-20 की पहली तिमाही में आर्थिक विकास दर 5 फ़ीसदी रह गई है। जबकि पिछले वित्तीय वर्ष में इसी तिमाही में विकास दर 8 प्रतिशत थी। इससे साफ पता चलता है कि इस वित्तीय वर्ष में भारत की जीडीपी 3% की दर से कम चल रही है। वहीँ यदि पिछले वित्तीय वर्ष की आख़िरी तिमाही की बात करें तो आखिरी तिमाही में जीडीपी विकास दर 5.8 प्रतिशत थी।

अर्थशास्त्र के जानकारों ने इस पर बड़ा स्यापा किया –

बहस मुबाहिसों का लम्बा दौर इस पर चला है। सबने अपने अपने तर्क दिए हैं। उन्होंने इसे पिछली 25 तिमाहियों में सबसे धीमा तिमाही विकास करार दिया। यह मोदी सरकार के दौर की सबसे कम बढ़ोतरी थी। उन्होंने सरकार को इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार भी ठहराया। देश की अर्थव्यवस्था की तरक़्क़ी की रफ़्तार धीमी हो रही है। ऐसा उन्होंने माना। खुद सरकार नें भी कमी की बात मानी और इस बात को भी स्वीकारा कि अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए बड़े कदम उठाये जाएँ।

सुस्ती की वजह से ही मंदी का सवाल भी उठा –

भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार दूसरी तिमाही में सुस्ती से आगे बढ़ी है। इसी से यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या हम आर्थिक मंदी की तरफ़ बढ़ रहे हैं? कुछ लोग भारत में धीमी गति से विकास की सुस्त गति की वजह दुनिया की सभी अर्थव्यवस्था में आयी सुस्ती को बताते हैं। एक जानकारी के मुताबिक –

भारतीय अर्थव्यवस्था में सब से बड़ा संकट 1991 में आया था, जब आयात के लिए देश का विदेशी मुद्रा रिज़र्व घट कर 28 अरब डॉलर रह गया था। आज ये राशि 491 अरब डॉलर है।

What Is GDP Explain In Hindi –

साल 2008-09 में एक बार फिर संसार भर में आई मंदी ने भारत पर भी असर डाला था। उस समय भारत की अर्थव्यवस्था 3.1 प्रतिशत के दर से बढ़ी थी। जो उसके पहले के सालों की तुलना में कम थी, उम्मीद कीजिये GDP के अगले आंकडें बेहतर हों आपको बता दें कि GDP में गिरावट के आंकड़ों के बाद चारों ओर मंदी का शोर है।

एक टेक्सटाइल कंपनी नें जहां पहली बार ऐड देकर अपनी ख़राब हालत को सबके सामने लाने का काम किया। वहीँ ऑटो सेक्टर में भी छंटनी शुरू कर दी गयी। पारले-जी जैसे बहुत बड़े और पुराने उद्यम ने भी अपने कर्मियों को बंदी के नाम पर बाहर का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया। हालात पर गौर करने के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कुछ ही दिन पहले कई क़दमों का एलान किया, जिससे नकारात्मक दिशा में जा रहे industry को boost मिलने की सम्भावना जताई जा रही है।

माना तो यह जा रहा है कि इसका सकारात्मक असर निवेशकों और ग्राहकों के मूड पर पड़ेगा। त्योहारों का सीजन शुरू हो चूका है। भरोसा करना चाहिए कि GDP के आने वाले आंकड़े अच्छे हालात की खबर सुनायेंगे। फिलहाल विकास पूर्वानुमान में कमी की तरफ इशारा किया गया। एशियन डेवेलपमेंट बैंक ने भारत के विकास पूर्वानुमान की दर को वर्तमान वित्तीय वर्ष के लिए 7.2 फीसदी से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया है।

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