घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 क्या है? Domestic Violence Act में क्या क्या शामिल है? महिलाओं के अधिकार क्या हैं?

घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 – दोस्तों, एक समय था, जब महिलाएं घर की चारदीवारी के भीतर हो रहे जुल्म को चुपचाप सह लेती थीं। सगे-संबंधी रिश्ते के नाम पर उनका नाजायज फायदा उठा लेते थे। वह सिर्फ घुटती, रोती रह जाती थी। ऐसे कई मामले सामने आए, जिसमें पति या अन्य किसी संबंधी ने महिला को मारपीट कर घर से निकाल दिया। महिला इसे अपना भाग्य समझकर सहती थीं। इसे अपनी किस्मत का दोष मान लेती थीं। किसी भी तरह के जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने में वह हिचकती थीं।

घरेलू हिंसा अधिनियम क्या है? Domestic Violence Act में क्या क्या शामिल है? महिलाओं के अधिकार क्या हैं?

लेकिन शिक्षा का प्रसार होने के साथ उनमें जागरूकता आई। उन्हें उनके अधिकारों की जानकारी हुई। लेकिन इसके बावजूद कई महिलाएं परिवार के दबाव और कोर्ट-कचहरी के चक्कर से बचने के लिए मामला दर्ज करने से हिचकिचाती थीं। ऐसे में उन्हें राहत दी घरेलू हिंसा अधिनियम यानी Domestic Violence Act 2005 ने। दोस्तों, क्या आपको पता है कि यह घरेलू हिंसा अधिनियम क्या है? इसके तहत किस किस तरह की हिंसा को शामिल किया गया है? महिलाओं के अधिकार क्या हैं? अगर आप इस बारे में नहीं जानते तो भी चिंता की बात नहीं। हम इस post के जरिए आपको घरेलू हिंसा अधिनियम और महिलाओं के अधिकारों के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे –

घरेलू संबंध का मतलब क्या है –

अनुक्रम

दोस्तों, घरेलू हिंसा अधिनियम से पहले जान लें कि घरेलू संबंध से क्या आशय है। हम आपको बता दें कि जब दो व्यक्ति जो एक ही घर में रहते हों या रह चुके हों और जिनके बीच रक्त संबंध हो, शादी- विवाह या adoption का रिश्ता हो, वह घरेलू संबंध कहलाता है। इस परिभाषा के तहत joint family यानी संयुक्त परिवार को भी शामिल किया गया है। ऐसे में इसमें से किसी भी संबंध में रह रही महिला अपने साथ घरेलू संबंधों में हुई हिंसा को लेकर शिकायत कर सकती है। उसे पीड़ित माना जाएगा। वह अपने ऊपर हो रही ज्यादती की शिकायत कर न्याय की मांग कर सकती है। यहां यह भी साफ कर दें कि इसके साथ ही live in relationship में रहने वाली महिला भी घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत न्याय की मांग कर सकती है।

घरेलू हिंसा अधिनियम क्या है? Domestic Violence Act In Hindi –

यदि आज से 14 साल पहले तक की बात करें तो, महिलाओं के पास घरेलू हिंसा के खिलाफ केवल आपराधिक मामला दर्ज करने का अधिकार था। ऐसे मामलों में भारतीय दंड संहिता यानी Indian penal code, जिसे IPC भी पुकारा जाता है, की धारा 498A के तहत कार्यवाही होती थी। दोषी को सजा दी जाती थी। लेकिन सन् 2005 में घरेलू हिंसा अधिनियम पारित हुआ। इस अधिनियम के जरिये हिंसा की शिकार महिलाओं को कई अधिकार मिले। इनमें उनके लिए रहने की जगह, उन्हें गुजारा भत्ते का अधिकार आदि अधिकार शामिल थे। इस अधिनियम का पूरा नाम घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं का संरक्षण अधिनियम – 2005 रखा गया,जिसे देश भर में आज से करीब 13 साल पहले यानी 26 अक्तूबर, 2006 को लागू किया गया।

Civil Act है घरेलू हिंसा अधिनियम –

आपको बता दें कि यह एक गैर आपराधिक अधिनियम यानी civil act है। मूल रूप से इस अधिनियम को लाए जाने का मकसद किसी को सजा देना नहीं, बल्कि पीड़ित महिला को त्वरित राहत दिलाना है। उसके साथ घरेलू हिंसा की स्थिति में उसकी आर्थिक, रिहायशी, सुरक्षा आदि समस्याओं का समाधान करना है।

थाने, पुलिस के चक्कर से बचने वाली महिलाओं के लिए राहत –

घरेलू हिंसा अधिनियम को लाए जाने का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि जो महिलाएं पारिवारिक या सामाजिक दबाव के चलते पुलिस थानों के चक्कर काटने से बचती हैं, परिजनों, रिश्तेदारों पर आपराधिक मामला दर्ज नहीं कराना चाहती, यह अधिनियम उन्हें संरक्षण प्रदान करता है। इस अधिनियम के तहत दोषी साबित होने पर व्यक्ति को तीन साल तक की कैद हो सकती है।

घरेलू हिंसा में शारीरिक ही नहीं, अन्य प्रकार की हिंसा भी शामिल –

घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत हिंसा की परिभाषा का दायरा विस्तृत है। इसमें केवल शारीरिक हिंसा ही नही, बल्कि मानसिक प्रताडना, भावनात्मक उत्पीड़न और यहां तक कि आर्थिक हिंसा को भी शामिल किया गया है। मोटे तौर पर किसी भी घरेलू संबंध या रिश्तेदारी में किसी प्रकार का व्यवहार, आचरण या बर्ताव, जिससे किसी महिला के स्वास्थ्य, सुरक्षा, किसी अंग या जीवन को क्षति पहुंचती है घरेलू हिंसा के दायरे में आता है। शादीशुदा महिलाएं या पत्नी ही नहीं, बल्कि महिला रिश्तेदारों के लिए भी राहत का प्रावधान इस अधिनियम में किया गया है।

मोटे तौर पर घरेलू हिंसा में शामिल हैं –

दहेज की मांग –

शादी के बाद दहेज की मांग भी घरेलू हिंसा की ही श्रेणी में आती है। इसमें महिला को क्षति पहुंचाना, उसका उत्पीड़न करना, उसके रिश्तेदारों को धमकाने की नीयत से उसका उत्पीड़न इसी श्रेणी में आता है।

शारीरिक हिंसा –

कोई भी ऐसा कार्य या आचरण, जो महिला को शारीरिक पीड़ा देता है, जिससे उसके स्वास्थ्य या शारीरिक विकास को हानि पहुंचती है उसे इस दायरे में रखा जाता है। महिला के ऊपर किसी तरह के हमले या बल प्रयोग को भी इसी श्रेणी में रखा जाएगा। उदाहरण के लिए- महिला पर हाथ उठाना, उसके साथ मारपीट करना, थप्पड़ मारना, दांत से काटना, ठोकर मारना, लात मारना आदि। इसके अलावा अगर महिला बीमार है उसे उपचार की जरूरत है तो उसका उपचार न कराया जाना भी घरेलू हिंसा के ही दायरे में आएगा।

लैंगिक हिंसा –

ऐसा कोई भी काम जिससे महिला की अस्मिता, उसकी गरिमा को चोट पहुंचे वह लैंगिक हिंसा है। इसे साधारण शब्दों में कहें तो, ऐसा कोई भी बर्ताव, जिससे महिला को कमतरी का अहसास कराया जाए या उससे इस आधार पर किसी भी तरह की ज्यादती हो, यह लैंगिक हिंसा के तहत आता है। उदाहरण के लिए किसी भी महिला के साथ संबंध बनाने के लिए की जाने वाली ज्यादती, बलात्कार या शादी के पश्चात बलपूर्वक बनाए गए संबंध, अश्लील सामग्री पढने या देखने के लिए मजबूर किया जाना, अपमानित करने के नजरिये से किया गया बर्ताव भी लैंगिक हिंसा के ही दायरे में माना जाएगा।

मौखिक, भावनात्मक हिंसा –

महिला संग गाली गलौज, अभद्र भाशा का प्रयोग, चरित्र और आचरण पर आरोप लगाना उसके रिश्तेदारों के लिए अभद्रतापूर्ण भाषा का प्रयोग करना यह सभी मौखिक, भावनात्मक हिंसा की श्रेणी में आएगा। इसमें महिला का पुत्र या संतान उत्पन्न न होने पर किया जाने वाला अपमान, तिरस्कार या उपहास, नौकरी न करने या छोडने के लिए मजबूर किया जाना, अपने मन से विवाह न करने दिया जाना, किसी व्यक्ति विशेष से शादी को मजबूर किया जाना, मनपसंद पहनावा न पहनने देना आदि भी शामिल है।

आर्थिक हिंसा –

दोस्तों, अगर महिला किसी आर्थिक संसाधन या संपत्ति पर हक रखती हो, ऐसे में उस संपत्ति या संसाधन से उसे वंचित रखना या स्त्रीधन से वंचित रखना उसके प्रति आर्थिक हिंसा के दायरे में रखा जाएगा। मसलन आपको या आपके बच्चे को अपनी देखभाल के लिए धन और संसाधन न देना,आपको अपना रोजगार न करने देना या उसमें रूकावट डालना, आपकी आय, वेतन आदि आपसे ले लेना, घर से बाहर निकाल देना आदि।

घरेलू हिंसा की शिकायत कैसे करें?

घरेलू हिंसा से आजिज कोई भी महिला इसकी शिकायत 1091 हेल्प लाइन नंबर पर भी कर सकती है। इसके अलावा घरेलू हिंसा की शिकायत किसी भी पुलिस अफसर, संरक्षण अधिकारी, मजिस्ट्रेट या सेवा प्रदाता से की जा सकती है। आपको बता दें कि यहां सेवा प्रदाता से तात्पर्य उन स्वैच्छिक संस्थाओं से है, जो रजिस्टर्ड हैं। इनके पास घरेलू हिंसा रिपोर्ट बनाने का, पीडिता की चिकित्सीय जांच कराने का और पीडिता को आश्रय दिलाने का अधिकार होता है। मजिस्टेट से मतलब उस न्यायिक मजिस्टेट से समझ सकते हैं, जिसके कार्य क्षेत्र में हिंसा घटित हुई है। इस अधिनियम के तहत संरक्षण अधिकारी भी नियुक्त किए जाते हैं।जिनके पास पीड़ित महिला शिकायत कर सकती है।

घरेलू हिंसा और महिलाओं के अधिकार –

साथियों, देश के संविधान में महिलाओं को कई अधिकार प्रदान किए गए हैं। इनमें से कई अधिकारों की उन्हें आज भी जानकारी नहीं। महिलाओं के कुछ खास अधिकार इस प्रकार हैं –

घरेलू हिंसा से सुरक्षा का अधिकार –

साथियों, जैसा कि हम ऊपर बता चुके हैं। महिलाओं के प्रति किसी भी तरह की शारीरिक, मौखिक, आर्थिक या यौन हिंसा धारा 498ए के तहत दंडनीय बनाई गई है। दहेज अधिनियम 1961 की धारा 3 और 4 में दहेज लेने या देने के लिए ही नहीं मांगने पर भी दंड की व्यवस्था की गई है। घरेलू हिंसा अधिनियम महिलाओं की उचित स्वास्थ्य देखभाल, कानूनी मदद, परामर्श और आश्रय गृह संबंधी मामलों में सहायता देता है।

निशुल्क कानूनी सहायता का अधिकार –

अक्सर यह होता है कि जब भी महिला अकेले पुलिस स्टेशन में बयान दर्ज कराने जाती है तो उसके बयान को तोड़-मरोड़कर लिखे जाने का अंदेशा रहता है। ऐसे में महिला कानूनी मदद की मांग कर सकती है। यह पाने का उसे अधिकार दिया गया है।

गोपनीयता का अधिकार –

महिलाओं को बयान दर्ज कराने के मामले में गोपनीयता का भी अधिकार प्राप्त है। बलात्कार की शिकार महिला की निजता बनाए रखना जरूरी है। पीड़िता का नाम और पहचान सार्वजनिक नहीं की जा सकती। महिला जिला मजिस्टेट के सामने अपने बयान दर्ज करा सकती है। जब मामले की सुनवाई चल रही तो तो वहां किसी और व्यक्ति को मौजूद रहने की आवश्यकता नहीं है। यहां यह सुविधा भी दी गई है कि अगर महिला चाहे तो एक ऐसे सुविधाजनक स्थान पर केवल एक पुलिस अधिकारी और महिला कांस्टेबल के साथ बयान रिकार्ड कर सकती है जो भीड़ भरा न हो।

देर से भी शिकायत दर्ज करने का अधिकार –

पुलिस देरी का बहाना बनाकर शिकायत दर्ज करने से नहीं बच सकती। खास तौर से बलात्कार या छेड़-छाड़ के मामले में महिलाओं को देर से भी शिकायत दर्ज करने का अधिकार दिया गया है। दरअसल, बलात्कार की स्थिति में यह माना जाता है कि महिला सदमे में होगी ऐेसे में रिपोर्ट लिखवाने में देरी होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। वह अपनी सुरक्षा और प्रतिष्ठा को लेकर डर भी सकती है। लिहाजा काफी वक्त बीत जाने के बाद भी वह अपने ख़िलाफ़ यौन अपराध का मामला दर्ज करा सकती है।

सुरक्षित कार्यस्थल का अधिकार –

महिलाओं को सुरक्षित कार्यस्थल का भी अधिकार दिया गया है। यही वजह है कि हर कार्यालय में नियोक्ता को एक यौन उत्पीडन शिकायत समिति भी बनानी आवश्यक की गई है। यह भी जरूरी किया गया है कि समिति की मुखिया एक महिला हो और इस समिति की 50 फीसदी सदस्य महिलाएं ही हों। जरूरी नहीं कि वह स्थाई कर्मचारी ही हो। चाहे महिला इंटर्न हो, पार्ट टाइम कर्मचारी हो आफिस में आने वाली कोई महिला या इंटरव्यू के लिए आई कोई महिला ही क्यों न हो। वह उत्पीड़न के मामले में समिति के पास शिकायत दर्ज करा सकती है।

शिकायत घटना के तीन माह के भीतर लिखित रूप में की जा सकती है। यह भी बता दें कि अगर कंपनी में दस या अधिक कर्मचारी हैं और चाहे उसमें एक ही महिला है तो भी समिति गठित करना जरूरी होगा। इस समिति से मदद न मिलने की स्थिति में महिला की ओर से जिला शिकायत समिति से शिकायत की जा सकती है। अगर आप शिकायत दर्ज नहीं कर पा रही हैं तो आपकी ओर से कोई और भी शिकायत दर्ज करा सकता है।

जीरो एफआईआर का अधिकार भी –

एक महिला को जीरो एफआईआर कराने का भी अधिकार है। मसलन अगर कोई बलात्कार पीड़िता है तो वह किसी भी पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कर सकती है। पुलिस यह कहकर एफआईआर से इन्कार नहीं कर सकती कि क्षेत्र उसके दायरे में नहीं आता। यह भी व्यवस्था है कि अगर पीड़िता किसी वजह से पुलिस स्टेशन नहीं जा सकती तो भी वह ईमेल या पंजीकृत डाक के जरिये शिकायत दर्ज करा सकती है। उसे यह लिखित शिकायत डीसीपी या पुलिस कमिश्नर स्तर के अधिकारी को भेजनी होती है।

इंटरनेट पर सुरक्षा का अधिकार –

किसी भी महिला की सहमति के बगैर उसकी फोटो या वीडियो इंटरनेट पर अपलोड करना अपराध घोषित किया गया है। IT Act यानी सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 और 66-E बिना किसी व्यक्ति की अनुमति के उसके निजी क्षणों की तस्वीर खींचे जाने, उन्हें प्रकाशित या प्रसारित किए जाने पर रोक लगाती है। आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम-2013 की धारा 354-C के तहत किसी महिला की निजी तस्वीर को बगैर अनुमति खींचा या साझा करना अपराध माना गया है।

समान वेतन का अधिकार –

समान कार्य के लिए समान पारिश्रमिक का अधिकार भी महिलाओं को मिला है। समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 इसके लिए प्रावधान करता है। यह अधिनियम भर्ती और सेवा शर्तों में महिलाओं के खिलाफ लिंग के आधार पर भेदभाव को भी रोकता है।

तो दोस्तों यह थी घरेलू हिंसा अधिनियम के साथ ही महिलाओं के अन्य अधिकारों से जुडी तमाम जानकारी। उम्मीद है कि आपको यह जानकारी पसंद आई होगी। अगर इस post को पढकर आपके दिमाग में आ रहा है कोई भी सवाल तो comment करके आप पा सकते हैं हमसे अपने सवाल का जवाब। तो देर मत कीजिए। जो भी जिज्ञासा है, उसे पूछ डालिए। सरल और सटीक जवाब देने की पूरी पूरी कोशिश रहेगी।। धन्यवाद ।।

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