दया याचिका क्या होती है? | दया याचिका किसको भेजी जाती है? | Daya yachika kya hai

Daya yachika kya hai:- हर देश का अपना एक कानून होता है जो उसके संविधान के अंतर्गत आता है। इस कानून में कई तरह की धाराएँ और अनुच्छेद होते हैं। एक तरह से कहा जाए तो संविधान में अनुच्छेद होते हैं जबकि कानून में धाराएँ होती है। अनुच्छेद वे होते हैं जो हमें कार्य करने के बारे में बताते हैं जबकि धाराएँ वह होती है जो कानून का उल्लंघन करने पर लगाई जाती है या उसके बारे में बताती है। भारतीय कानून हरेक उस व्यक्ति पर लागू होता है जो भारत में रह रहा है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति अपराध करता है तो उसे भारतीय कानून के अनुसार दंड दिया जाता (Mercy petition in Hindi) है।

अब यदि कोई व्यक्ति गंभीर अपराध करता है तो भारत के न्यायालय के द्वारा उसे मृत्यु दंड की सजा सुनायी जाती है। यदि उसे जिला न्यायालय से मृत्यु दंड मिला है तो वह उसके विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है। वहां भी उसकी सजा बरकरार रखी जाती है तो वह सर्वोच्च न्यायालय जाता है। अब यदि सर्वोच्च न्यायालय भी उसे मृत्यु दंड ही सुनाता है तो उसके पास आखिरी विकल्प दया याचिका का होता (Mercy petition kya hai) है।

ऐसे में यह दया याचिका क्या होती है और इसको लगाने की क्या कुछ प्रक्रिया है, उसके बारे में जान लेते हैं। पहले के समय में दया याचिका लगाने का काम अलग था लेकिन हाल ही में भारत सरकार ने भारतीय दंड संहिता को भारतीय न्याय संहिता में बदला है, तब से इस दया याचिका में भी बहुत बदलाव किया गया है। ऐसे में हम आपको पुराने तरीके के साथ साथ नया तरीका भी बता (Daya yachika kya hai in Hindi) देंगे।

दया याचिका क्या होती है? (Daya yachika kya hai)

जैसा कि नाम से ही पता चलता है कि इसमें अपराधी अपने ऊपर दया दिखाने की याचना कर रहा होता है। याचिका का अर्थ याचना करने से हुआ जबकि दया तो आप सभी समझते ही हैं। अब हमारे देश तो क्या पूरी दुनिया में ही हर दिन या हर घंटे कई तरह के अपराध होते हैं। यह अपराध किसी भी तरह के हो सकते हैं और उनके लिए भारतीय कानून के अनुसार अलग अलग दंड का प्रावधान दिया गया है। उस व्यक्ति पर पूरी कानूनी कार्यवाही और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही उसे उचित दंड दिया जाता (Daya yachika ke bare mein bataiye) है।

दया याचिका क्या होती है

ऐसे में यदि किसी व्यक्ति ने बहुत ही बुरा या गंभीर अपराध किया है जो सभी को झकझोर दे तो उस स्थिति में भारतीय न्यायालय के द्वारा उसे मृत्यु दंड की सजा सुना दी जाती है। मृत्यु दंड का अर्थ होता है उस व्यक्ति को फांसी पर लटका दिया जाएगा और उसके जीवन का अंत कर दिया जाएगा। ऐसे में वह व्यक्ति न्यायालय में याचना करता है और उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाता है। यदि उसकी याचना को हर जगह से अस्वीकार कर दिया जाता है तो आखिरी विकल्प दया याचिका का ही होता (What is mercy petition in Hindi) है।

दया याचिका के तौर पर मृत्यु दंड पाया वह अपराधी देश के राष्ट्रपति या जिस राज्य में उसे दंड दिया गया है, वहां के राज्यपाल या गृह मंत्रालय को दया याचिका भेजता है। इसमें वह उनके सामने याचना करता है कि उसके मृत्यु दंड की सजा को बदल दिया जाए और उसे आजीवन कारावास या उससे कम दंड में परिवर्तित कर दिया जाये। तो इस तरह से यह दया याचिका वह देश के राष्ट्रपति या राज्य के राज्यपाल के पास भेजता (Mercy petition kya hai in Hindi) है।

अब इस दया याचिका पर निर्णय लेने का अधिकार राज्यपाल या राष्ट्रपति का ही होता है। हालाँकि यदि वह सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा मृत्यु दंड का पात्र बनाया गया है तो इसके लिए वह राज्य के राज्यपाल को दया याचिका नहीं भेज सकता है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटने का अधिकार संविधान ने राष्ट्रपति को दिया है।

दया याचिका किसको भेजी जाती है? (Daya yachika kisko bheji jaati hai)

ऊपर आपने पढ़ा कि दया याचिका देश के राष्ट्रपति से लेकर राज्यों के राज्यपाल को भेजी जा सकती है लेकिन इसका मुख्य आधार देश के राष्ट्रपति ही होते हैं। आइये इसे बेहतर तरीके से समझ लेते हैं। देश के हर जिले में एक जिला न्यायालय की व्यवस्था होती है। ठीक उसी तरह देश के हरेक राज्य में एक उच्च न्यायालय होती है जो उस राज्य की सबसे बड़ी अदालत होती है। इसी तरह से संपूर्ण देश की सबसे बड़ी अदालत सर्वोच्च न्यायालय होती है।

ठीक इसी तरह किसी भी राज्य का मुखिया राज्यपाल होता है तो वहीं देश का मुखिया राष्ट्रपति होता है। अब यदि किसी व्यक्ति को जिला न्यायालय ने मृत्यु दंड दिया है तो वह इसके विरुद्ध अपने राज्य के उच्च न्यायालय में अपील कर सकता है। अब यदि उसकी अपील वहां से भी ख़ारिज हो जाती है तो उसके पास दो विकल्प होते हैं। पहले विकल्प के अनुसार वह सर्वोच्च न्यायालय में अपील कर सकता है या फिर अपने राज्य के राज्यपाल के पास दया याचिका भिजवा सकता है। राज्यपाल अपने विवेक के आधार पर उसे ख़ारिज भी कर सकते हैं या उस सजा को परिवर्तित भी कर सकते हैं।

अब यदि वह राज्यपाल के पास जाने की बजाये सर्वोच्च न्यायालय जाता है और वहां भी उसकी अपील को ख़ारिज कर दिया जाता है तो उसके पास देश के राष्ट्रपति के पास दया याचिका लगाने का ही विकल्प बचता है। उस स्थिति में वह देश के राष्ट्रपति को दया याचिका भेजता है जो गृह मंत्रालय से होकर गुजरती है। एक तरह से उसे गृह मंत्रालय भी खारिज कर सकता है लेकिन वह सजा में परिवर्तन करने का अधिकार नहीं रखता है।

कहने का अर्थ यह हुआ कि गृह मंत्रालय के पास केवल उस याचिका को ख़ारिज करने का अधिकार होता है, ना कि मृत्यु दंड को बदलने का। अब यदि गृह मंत्रालय उसे स्वीकार कर लेता है तो वह राष्ट्रपति के पास भेजी जाती है। राष्ट्रपति भी उसे ख़ारिज कर देते हैं तो अपराधी के सभी विकल्प समाप्त हो जाते हैं और उसे मृत्यु दंड मिलना तय हो जाता है। वहीं राष्ट्रपति इस दया याचिका को स्वीकार कर उसके मृत्यु दंड को आजीवन कारावास या इससे कम कारावास में भी परिवर्तित कर सकते हैं।

दया याचिका ख़ारिज होने के बाद क्या होता है?

अब यहाँ पर पुराने कानून और नए कानून में अंतर देखने को मिलता है। पुराने कानून के अनुसार यदि देश के राष्ट्रपति अपराधी के द्वारा भेजी गयी दया याचिका को अस्वीकार या ख़ारिज कर देते हैं तो भी अपराधी के पास विकल्प बचा होता है। वह देश के सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका लगा सकता था और राष्ट्रपति के निर्णय को चुनौती दे सकता था। यदि सर्वोच्च न्यायालय पुनर्विचार याचिका को स्वीकार कर लेता है तो वह उसके मृत्यु दंड को यथावत भी रख सकता है और उसकी सजा को कम भी कर सकता है।

वहीं देश के गृह मंत्री श्री अमित शाह जी ने हाल ही में देश की संसद में नए कानून पास करवाए हैं। इसके अनुसार अपराधी की दया याचिका पर राष्ट्रपति जो भी निर्णय लेते हैं, वह निर्णय अंतिम होगा और उस निर्णय को भारत की किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है। स्वयं सर्वोच्च न्यायालय भी उसके बाद उस अपराधी की सजा में कोई परिवर्तन नहीं कर सकता है।

ऐसे में यदि राष्ट्रपति जी दया याचिका को खारिज कर देते हैं तो अपराधी को मृत्यु दंड मिलना अनिवार्य है और वहीं वे इसे स्वीकार कर मृत्यु दंड को आजीवन कारावास या अन्य दंड में बदल देते हैं तो वह निर्णय भी अंतिम निर्णय माना जाएगा। इस पर कहीं भी कोई सुनायी नहीं होगी। चूँकि अब नया कानून लागू है तो पुराने कानून को भूल जाएं।

दया याचिका कौन लगा सकता है? (Daya yachika kaun laga sakta hai)

इसमें भी पुराने कानून और नए कानून में भेद देखने को मिलता है। कहने का अर्थ यह हुआ कि यदि पाकिस्तान के किसी आतंकवादी ने भारत में घुसकर त्राहिमाम मचाया है और उसे भारतीय कानून ने मृत्यु दंड दिया है तो उसके लिए दया याचिका देश का कोई भी देशद्रोही लगा सकता था। ऐसा भूतकाल में कई बार देखने को मिला जब देश के गद्दारों ने आतंकी कसाब के लिए ना केवल आंसू बहाए बल्कि उसके लिए दया याचिका भी लगायी।

नए कानून के अनुसार यदि किसी अपराधी को सर्वोच्च न्यायालय से मृत्यु दंड मिला है तो ऐसे में अपराधी स्वयं, कानूनी रूप से उसका उत्तराधिकारी या उसके परिवार का कोई सदस्य ही दया याचिका लगाने का अधिकार रखता है। उस व्यक्ति का कोई परिचित, मित्र या अन्य अनजान व्यक्ति संबंधित व्यक्ति के लिए दया याचिका नहीं लगा सकता है।

दया याचिका कब तक लगायी जा सकती है? (Daya yachika time limit in Hindi)

इसमें भी नए कानून में परिवर्तन किया गया है क्योंकि पुराने कानून के अनुसार इसके लिए कोई समय सीमा ही निर्धारित नहीं थी। ऐसे में अपराधी एकदम अंत समय में दया याचिका लगाते थे ताकि उन्हें जीवित रहने का और समय मिल जाए। नए कानून के अनुसार कारावास के अधीक्षक उस अपराधी के बारे में जब भी लिखते हैं अर्थात उसे जब भी कारावास में मृत्युदंड के अपराधी के रूप में लाया जाता है, तो उसके 30 दिनों के अंदर अंदर उसे दया याचिका लगानी जरुरी (Mercy petition time limit in Hindi) होगी।

यदि वह इन 30 दिनों के अंतराल में दया याचिका नहीं लगाता है तो वह दया याचिका लगाने के अपने अधिकार से वंचित रह जाएगा। ऐसा इसलिए किया गया है कि अपराधी पेचीदा कानून का लाभ ना उठा सके और भारतीय न्यायिक व्यवस्था का मजाक ना बना पाए।

दया याचिका का संविधान में उल्लेख

दया याचिका को संविधान में भी लिखा गया है। संविधान का अनुच्छेद 72 देश के राष्ट्रपति को यह शक्ति देता है कि वह सर्वोच्च न्यायालय से मृत्यु दंड मिले अपराधी को क्षमा करने का अधिकार रखता है। वहीं संविधान का ही अनुच्छेद 161 देश के सभी राज्यपालों को अपने अपने राज्य के उच्च न्यायालय के द्वारा मृत्यु दंड पाए अपराधी को क्षमा करने का अधिकार देता है।

वहीं भारत सरकार के द्वारा जो नया कानून बनाया गया है जिसे हम भारतीय न्याय संहिता के नाम से जानते हैं उसकी धारा 472 में यह सब लिखा गया है। ऊपर बताये गए सभी प्रावधान व नियम इसी धारा के अंतर्गत ही जोड़े गए हैं जो राष्ट्रपति या राज्यपाल के द्वारा दया याचिका पर निर्णय लेने की व्याख्या करते हैं।

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दया याचिका क्या होती है – Related FAQs

प्रश्न: दया याचिका कब दायर की जा सकती है?

उत्तर: जब भी अपराधी को कारावास में मृत्युदंड के अपराधी के रूप में लाया जाता है, तो उसके 30 दिनों के अंदर अंदर उसे दया याचिका लगानी जरुरी होगी।

प्रश्न: दया याचिका देने का उद्देश्य क्या है?

उत्तर: दया याचिका से अपराधी अपने राज्य के राज्यपाल और राष्ट्रपति से अपनी सजा कम करने की दया मांगता है।

प्रश्न: दया याचिका कौन दायर कर सकता है?

उत्तर: अपराधी स्वयं, कानूनी रूप से उसका उत्तराधिकारी या उसके परिवार का कोई सदस्य ही दया याचिका लगाने का अधिकार रखता है।

प्रश्न: दया याचिका क्या होती है?

उत्तर: जब भी किसी अपराधी को मृत्यु दण्ड की सजा मिलती है तो वह राज्यपाल या राष्ट्रपति से अपनी सजा कम करवाने के लिए कहता है उसे ही दया याचिका कहा जाता है।

तो इस तरह से इस लेख के माध्यम से आपने जाना कि दया याचिका क्या होती है। साथ ही आपने दया याचिका से संबंधित अन्य जानकारी भी इस लेख के माध्यम से प्राप्त की है जैसे कि दया याचिका किसको भेजी जाती है दया याचिका खारिज होने के बाद क्या होता है और दया याचिका कौन और कब तक लगा सकता है इत्यादि। आशा है कि जो जानकारी लेने के लिए आप इस लेख पर आए थे वह आपको मिल गई होगी। फिर भी यदि कोई प्रश्न मन में शेष है तो नीचे कॉमेंट करके पूछ सकते हैं।

लविश बंसल
लविश बंसल
लविश बंसल वर्ष 2010 में लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया और वहां से वर्ष 2014 में बीटेक की डिग्री ली। शुरुआत से ही इन्हें वाद विवाद प्रतियोगिता में भाग लेना या इससे संबंधित क्षेत्रों में भाग लेना अच्छा लगता था। इसलिए ये काफी समय से लेखन कार्य कर रहें हैं। इनके लेख की विशेषता में लेख की योजना बनाना, ग्राफ़िक्स का कंटेंट देखना, विडियो की स्क्रिप्ट लिखना, तरह तरह के विषयों पर लेख लिखना, सोशल मीडिया कंटेंट लिखना इत्यादि शामिल है।
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