कॉलेजियम सिस्टम क्या है? | कॉलेजियम सिस्टम कैसे काम करता है? | Collegium system in Hindi

Collegium system in Hindi :- भारत देश में विधायिका अर्थात जनप्रतिनिधियों को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। वह इसलिए क्योंकि उनका चयन देश के नागरिकों के द्वारा किया जाता है जबकि अन्य सभी स्तंभ पर जो भी व्यक्ति आसीन होते हैं, वे पढ़ाई या शिक्षा के जरिये उस पद तक पहुँचते हैं। अन्य तीन स्तंभ न्यायपालिका, कार्यपालिका व पत्रकारिता होते हैं। अब इसमें कार्यपालिका पूरी तरह से विधायिका के अधीन आती है जबकि पत्रकारिता स्वतंत्र है लेकिन उसमें वैधानिक शक्तियां नहीं (Collegium system kya hai) है।

इसी में एक स्तंभ है न्यायपालिका का। संविधान ने विधायिका पर अंकुश लगाने के लिए न्यायपालिका का निर्माण किया है लेकिन इसी के साथ ही इस तरह का संतुलन स्थापित किया है कि न्यायपालिका विधायिका के कार्यों और शक्तियों में दखल भी नहीं दे सकती है। अब हमारा संविधान इतना वृहद् है कि अक्सर न्यायपालिका व विधायिका में टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और अंत में संविधान को ही सर्वोपरि का दर्जा दिया जाता (Collegium system kya h) है।

इसी में एक टकराव वाला कारण है कॉलेजियम सिस्टम जो सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़ा हुआ है। यहाँ हम एक बात पहले ही स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि हम किसी का भी विरोध या पक्ष नहीं ले रहे हैं बल्कि हम तथ्यात्मक पहलुओं को आपके समक्ष रखने जा रहे हैं। आज के इस लेख में हम कॉलेजियम सिस्टम क्या है और इससे संबंधित हरेक जानकारी का गहन अध्ययन कर आपके समक्ष रखने जा रहे (What is collegium system in Hindi) हैं।

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कॉलेजियम सिस्टम क्या है? (Collegium system in Hindi)

आज के इस लेख के माध्यम से हम आपको यह समझाना चाह रहे हैं कि यह कॉलेजियम सिस्टम है क्या चीज़ और यह कैसे काम करता है। अब विधायिका में जो बैठते हैं, उनका चयन देश के नागरिकों के द्वारा किया जाता है। इसमें हर पांच वर्ष में उस पद के लिए चुनाव होते हैं, फिर चाहे वह पार्षद के हो या विधायक या सांसद के चुनाव। इसमें नागरिकों के द्वारा जिस भी व्यक्ति को सबसे अधिक वोट दिए जाते हैं, वही व्यक्ति उस पद पर अगले पांच वर्ष के लिए बैठता (Collegium system kya hai in Hindi) है।

कॉलेजियम सिस्टम क्या है

ठीक इसी तरह कार्यपालिका में जो भी व्यक्ति काम करते हैं, उन्हें हम प्रशासन कहते हैं। वे प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर उस पद तक पहुँचते हैं और फिर उसके बाद कार्यपालिका के उच्च पद पर बैठे व्यक्ति और विधायिका मिलकर उनका प्रोमोशन करती है और उन्हें और बड़े पद तक पहुंचाने का काम करती है। पत्रकारिता स्वतंत्र होती है और यह निजी संस्था होती है। इसमें उस समाचार चैनल या साधन के मालिक ही उसका निर्णय करते हैं।

तो अब रह गयी न्यायपालिका। इसकी पूरी व्यवस्था अलग होती है। हमारे देश में हमारे साथ कहीं भी किसी भी तरह का अन्याय होता है, कोई अपराध होता है या कुछ भी अन्य अनैतिक कार्य होता है और हमें उसके लिए न्याय चाहिए होता है तो हम न्यायपालिका के समक्ष ही जाते हैं। यहाँ तक कि यदि हमारा विवाद विधायिका या कार्यपालिका से भी हो तो भी हम न्यायपालिका के सामने ही याचना करते हैं। वहां अधिवक्ताओं के माध्यम से केस लड़ा जाता है और उसका निर्णय वहां बैठे न्यायाधीश सुनाते (What is collegium system in Hindi) हैं।

अब वे न्यायाधीश हमारे लिए ईश्वर के समान होते हैं क्योंकि हमारे केस में क्या निर्णय आएगा और क्या नहीं, यह सबकुछ उन पर ही निर्भर करता है। इस पर हम प्रश्न चिन्ह नहीं लगा सकते हैं। ऐसे में उन न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रणाली ही यह कॉलेजियम सिस्टम होती है। इस कॉलेजियम सिस्टम के माध्यम से देश के सर्वोच्च न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालय में कब कौन व्यक्ति न्यायाधीश बनेगा, किसका कहाँ स्थानांतरण होगा, कौन पदोन्नत होकर सर्वोच्च न्यायालय में जाएगा और अगला मुख्य न्यायाधीश कौन बनेगा, इत्यादि का निर्णय किया जाता (What is collegium system in India in Hindi) है।

अब इसके बारे में बेहतर तरीके से समझने के लिए इसकी कार्यप्रणाली को समझना होगा। किन्तु उससे पहले आपको कॉलेजियम सिस्टम का इतिहास भी जान लेना चाहिए ताकि आपको इसकी कार्य प्रणाली को समझने में कोई दिक्कत ना हो।

कॉलेजियम सिस्टम कैसे बना? (Collegium system kaise bana)

देश की स्वतंत्रता के बाद से न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से काम करती रही थी लेकिन उस पर न्यायाधीशों की नियुक्ति व स्थानांतरण को लेकर हमेशा विवाद होता (When was the collegium system formed in Hindi) रहा। ऐसे में इसमें तीन बार परिवर्तन देखने को मिला जब सर्वोच्च न्यायालय व संसद के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न हुई। उसके बाद इसमें एक कानून तक बना दिया गया जिसे हम नीचे विवाद के रूप में बताएँगे।

प्रथम न्यायाधीश मामला (वर्ष 1981)

इसमें सबसे पहले टकराव की स्थिति तब उत्पन्न हुई थी जब वर्ष 1981 में इस कॉलेजियम सिस्टम में बदलाव किया गया। इसके तहत संसदीय प्रणाली के द्वारा यह प्रस्ताव पारित कर दिया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के द्वारा जो प्रस्तावित नाम दिए गए हैं, उन्हें ठोस कारणों के चलते निरस्त किया जा सकता है। इस तरह से अगले 12 वर्षों तक इसी नियम पर ही काम चलता रहा और विधायिका ने न्यायपालिका पर अंकुश स्थापित कर लिया था।

द्वितीय न्यायाधीश मामला (वर्ष 1993)

इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने 1993 में अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए यह बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के परामर्श का अर्थ सहमति ही होती है। उसे इस तरह से अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। ऐसे में कॉलेजियम सिस्टम के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के अलावा दो अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश भी होंगे और तीनों की राय एक संस्था की राय होगी। इस तरह से वर्ष 1993 में कॉलेजियम सिस्टम के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सहित 2 अन्य न्यायाधीश सम्मिलित हो गए।

तृतीय न्यायाधीश मामला (वर्ष 1998)

वर्ष 1998 में देश के राष्ट्रपति के द्वारा इस कॉलेजियम सिस्टम में बदलाव लाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत प्रेज़िडेंशियल रेफरेंस (Presidential Reference) का उपयोग किया गया। इसी के साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने कॉलेजियम सिस्टम में 3 न्यायाधीश की जगह 5 न्यायाधीश की एक कमेटी बना दी। इस कमेटी में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सहित सर्वोच्च न्यायालय के ही 4 अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश सम्मिलित होंगे और कॉलेजियम सिस्टम का सञ्चालन (Collegium system adopted in India in Hindi) करेंगे।

वर्तमान में कॉलेजियम सिस्टम कैसा है? (Collegium system current position in Hindi)

अब बात करते हैं वर्तमान में कौन सा कॉलेजियम सिस्टम प्रभावी है। तो आज के समय में तृतीय कॉलेजियम सिस्टम जो वर्ष 1998 में पारित किया गया था और जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सहित 4 अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश सम्मिलित थे, वही प्रभावी है। उनके द्वारा ही सर्वोच्च न्यायालय सहित उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है और उनके स्थानांतरण का कार्य किया जाता है।

हालाँकि इसमें भारत सरकार की भी प्रत्यक्ष तौर पर भूमिका होती है और इसी कारण न्यायपालिका व विधायिका में टकराव देखने को मिलता है। इसके लिए आपको यह समझना होगा कि आखिरकार यह कॉलेजियम सिस्टम काम कैसे करता है। तो आइये अब हम इसी विषय के ऊपर ही चर्चा करने वाले हैं।

कॉलेजियम सिस्टम कैसे काम करता है? (How does collegium system work in Hindi)

अब हम बात करते हैं इस कॉलेजियम सिस्टम के काम करने के बारे में अर्थात यह किस रूप में काम करता है और किस तरह से यह न्यायिक व्यवस्था को प्रभावित करता है। तो यह तो आप जान चुके हैं कि कॉलेजियम सिस्टम के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सहित अन्य 4 वरिष्ठ न्यायाधीश आते हैं लेकिन उनके हाथ में पूरी तरह से न्यायाधीशों की नियुक्ति या स्थानांतरण का दायित्व नहीं होता है। इसके लिए उन्हें केंद्र सरकार की अनुमति की आवश्यकता होती है। आइये सिलसिलेवार तरीके से इसके बारे में जान लेते (Collegium system kaise kaam karta hai) हैं।

  • यदि किसी उच्च न्यायालय या फिर सर्वोच्च न्यायालय में किसी न्यायाधीश की नियुक्ति करनी है या फिर किसी न्यायाधीश को पदोन्नत करना है और उसे सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनाना है या फिर उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाना है या फिर उसका स्थानांतरण किसी अन्य उच्च न्यायालय में करना है तो उसके लिए कॉलेजियम सिस्टम की एक सभा बैठती है।
  • फिर इस बैठक में तमाम निर्णय लिए जाते हैं और जिस भी न्यायाधीश की नियुक्ति, पदोन्नत या स्थानांतरण का काम करना है, उनके नाम तय करके केंद्र सरकार को भेज दिए जाते हैं।
  • अब यह केंद्र सरकार के विवेक पर निर्भर करता है कि वह इन नामों पर अपनी सहमति दे देती है या फिर इन्हें अस्वीकार कर पुनः कॉलेजियम सिस्टम के पास लौटा देती है।
  • यदि नाम पर सहमति मिल जाती है तो वह निर्णय प्रभावी मान लिए जाते हैं और अदि उन्हें अस्वीकृत किया जाता है और लौटा दिया जाता है तो कॉलेजियम सिस्टम की फिर से सभा बैठती है।
  • अब इस सभा में उन नामों पर पुनः विचार किया जाता है और यदि उसमें किसी तरह के बदलाव की आवश्यकता है तो वह करके पुनः केंद्र सरकार के पास भेज दिए जाते हैं।
  • अब केंद्र सरकार इन नामों को पुनः लौटा नहीं सकती है और उसे उस पर स्वीकृति देनी ही होती है। किन्तु उसके पास इन नामों को स्वीकृत करने की कोई समय सीमा नहीं होती है अर्थात वह कितने भी समय तक इन्हें अपने पास लटकाए रख सकती है।

तो इस तरह से हमारे देश में कॉलेजियम सिस्टम काम करता है। अब इसमें केंद्र सरकार की भूमिका केवल दिए गए नामों पर विचार करना, उन्हें लौटा देना या उन्हें स्वीकृत करना ही होता है जबकि बाकि सब कार्य कॉलेजियम सिस्टम के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश ही करते हैं। केंद्र सरकार स्वयं से किसी नाम को नहीं सुझा सकती है और ना ही अपनी इच्छा से किसी व्यक्ति की नियुक्ति या पद्दोनत या स्थानांतरित कर सकती है।

क्या कॉलेजियम सिस्टम संविधान में दर्ज है? (Collegium system in constitution in Hindi)

बहुत से लोगों को लग रहा होगा कि सर्वोच्च और उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति या स्थानांतरण से जुड़ा यह कॉलेजियम सिस्टम हमारे संविधान में अंकित है लेकिन ऐसा नहीं है। भारत देश के संविधान में कॉलेजियम सिस्टम के बारे में कोई उल्लेख नहीं मिलता है और यह बाद में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा स्वतः ही बनाया गया नियम है। ऐसे में हम इसे संवैधानिक प्रक्रिया नहीं कह सकते हैं और यही न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव की स्थिति उत्पन्न करता है।

कॉलेजियम सिस्टम को लेकर विवाद क्या है? (Collegium system vivad kya hai)

पिछले कई दशकों से और मुख्य तौर पर पिछले एक दशक से कॉलेजियम सिस्टम को लेकर बहुत ही विवाद चल रहा है। केंद्र सरकार इसको निरस्त करने के लिए बहुत जोर लगा रही है और इसी कारण भारतीय संसद और सर्वोच्च न्यायालय में खींचतान जोरों पर चल रही है। ऐसा इसलिए क्योंकि कॉलेजियम सिस्टम के अंतर्गत सभी भूमिकाएं सर्वोच्च न्यायालय के पहले से बने हुए न्यायाधीशों के ऊपर ही आ जाती है और भारत सरकार व कानून मंत्री का इस पर कोई अधिकार नहीं रह जाता है।

चूँकि कॉलेजियम सिस्टम के अंतर्गत जो पांच सदस्यों की पीठ है, वे पाँचों के पांच सदस्य सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश होने और केंद्र सरकार का कोई भी प्रतिनिधि इसमें नहीं होने के कारण, यह विवादों की वजह रहा है। यह न्यायपालिका को पूरी शक्ति दे देता है और जनता के द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों अर्थात विधायिका को हाशिये पर ला खड़ा करता है। भारत सरकार इसमें अपनी भूमिका भी लाना चाहती है और इसी कारण यह विवाद बनता जा रहा है।

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग क्या है? (Rashtriya nyayik niyukti aayog kya hai)

भारत देश में एक लंबे अंतराल के बाद कांग्रेस के अलावा किसी अन्य पार्टी की सरकार सत्ता में आयी थी। इतना ही नहीं, देश में पहली बार कांग्रेस के अलावा कोई अन्य पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ भारत की सत्ता में स्थापित हुई थी। वह राजनीतिक पार्टी भाजपा थी जिसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी बनाये गये थे। मई में प्रधानमंत्री का कार्यभार संभालने के बाद 15 अगस्त 2014 को ही संसद में 99वाँ संविधान संशोधन करके कॉलेजियम सिस्टम की जगह राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अर्थात NJAC को लागू किया गया था।

इस NJAC में कॉलेजियम सिस्टम की तरह ही 6 सदस्यों का आयोग बनाया गया था जो कॉलेजियम सिस्टम की ही तरह सब कार्य करने वाला था। इसमें जो 6 सदस्य थे, वह इस प्रकार हैं:

  • सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश
  • सर्वोच्च न्यायालय के 2 अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश
  • कानून मंत्री
  • 2 अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति

अब इस आयोग की अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को करनी थी। इसमें जो 2 अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं, उनका चुनाव 3 सदस्यों की टीम को करना था। उस टीम में सर्वोच्च न्यायालय के ही मुख्य न्यायाधीश, देश के प्रधानमंत्री व लोकसभा में विपक्ष के नेता को करनी थी। यदि किसी कारणवश लोकसभा में विपक्ष का नेता नहीं है तो सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता को इसका सदस्य बनाया जाना था। इस कानून को संसद के द्वारा मान्यता दे दी गयी और राष्ट्रपति के भी हस्ताक्षर हो गए।

इसके एक वर्ष के बाद ही 16 अक्टूबर 2015 को सर्वोच्च न्यायालय ने इस संविधान संशोधन को निरस्त कर दिया और इसे न्यायपालिका की शक्तियों में हस्तक्षेप करार दिया। इस कारण 16 अक्टूबर के बाद से ही संसद के द्वारा पारित यह कानून निष्प्रभावी हो गया और कॉलेजियम सिस्टम फिर से लागू हो गया। उसी के बाद से केंद्र सरकार व न्यायपालिका में थान गयी थी जो आज तक जारी है।

कॉलेजियम सिस्टम के फायदे (Collegium system ke fayde)

कॉलेजियम सिस्टम के कुछ फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी हैं। आपको अभी तक कॉलेजियम सिस्टम के बारे में लगभग सभी जानकारी मिल चुकी है जिसे पढ़कर आपको इसके लाभ व हानि समझ आ ही गए होंगे। फिर भी हम आपके समक्ष एक एक करके दोनों की ही जानकारी रख देते हैं। तो कॉलेजियम सिस्टम के फायदे यह हैं कि यह न्यायपालिका को विधायिका के प्रभाव से मुक्त रखने और निष्पक्ष कार्य करने की शक्ति देती (Benefits of collegium system in Hindi) है।

जहाँ एक ओर, संविधान ने कार्यपालिका को विधायिका के नीचे रखने का काम किया है जिस कारण विधायिका देश का सञ्चालन अच्छे से कर सके तो वहीं न्यायपालिका को स्वतंत्र किया है ताकि वह विधायिका पर अंकुश लगा सके। ऐसे में विधायिका का न्यायपालिका में हस्तक्षेप नहीं होने के कारण वह सही रूप में और जल्दी कार्य कर पाती है और सरकारों के चक्कर में नही पड़ती है। यही कॉलेजियम सिस्टम का सबसे बड़ा लाभ (Advantages of collegium system in Hindi) है।

कॉलेजियम सिस्टम के नुकसान (collegium system ke nuksan in Hindi)

कॉलेजियम सिस्टम का जितना फायदा है, उतना ही इसका बड़ा नुकसान भी है। जिस प्रकार विधायिका होती है, ठीक उसी तरह न्यायपालिका भी होती है। अब संविधान ने विधायिका पर अंकुश लगाने के लिए तो न्यायपालिका को रख लिया है और इसी के साथ ही यदि वह ठीक से काम नहीं करती है तो उसे तो वैसे भी 5 वर्षों के बाद चुनावों में उतरना होता है। ऐसे में जनता के द्वारा उसे हराकर उस पर अंकुश लगाया जा सकता (Disadvantages of collegium system in Hindi) है।

वहीं न्यायपालिका को स्वतंत्रता देने के मामले में यह कॉलेजियम सिस्टम कुछ आगे ही निकल जाता है जिस कारण न्यायपालिका निरंकुश हो जाती है। अब न्यायपालिका पर अंकुश लगाने के लिए विधायिका का या अन्य किसी बॉडी का उस पर अंकुश लगाना बहुत ही आवश्यक है। कॉलेजियम सिस्टम के होने से न्यायपालिका में भी भाई भतीजावाद बहुत बढ़ गया है जो भारत के संविधान व नैतिक धारणा के अनुरूप नहीं चल रहा (Drawbacks of collegium system in Hindi) है।

वहीं विधायिका में नागरिकों के द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही देश का सञ्चालन करते हैं जबकि न्यायपालिका में तो व्यक्ति शिक्षा के दम पर आगे बढ़ता है। ऐसे में जनता के प्रतिनिधि को ही सर्वोच्च स्थान दिया जाना चाहिए जो कि जनमानस के आधार पर निर्णय करते हैं। इसलिए कॉलेजियम सिस्टम के कारण न्यायपालिका निरंकुश होती जा रही है जो भविष्य की दृष्टि से हानिकारक होता जा रहा है।

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कॉलेजियम सिस्टम क्या है – Related FAQs 

प्रश्न: कॉलेजियम सिस्टम का अर्थ क्या है?

उत्तर: कॉलेजियम सिस्टम के माध्यम से देश के सर्वोच्च न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालय में कब कौन व्यक्ति न्यायाधीश बनेगा, किसका कहाँ स्थानांतरण होगा, कौन पदोन्नत होकर सर्वोच्च न्यायालय में जाएगा और अगला मुख्य न्यायाधीश कौन बनेगा, इत्यादि का निर्णय किया जाता है।

प्रश्न: कॉलेजियम सिस्टम कब शुरू हुआ?

उत्तर: वर्तमान कॉलेजियम सिस्टम की शुरआत 1998 से हो गई थी।

प्रश्न: कॉलेजियम में कितने जज होते हैं?

उत्तर: कॉलेजियम में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सहित 4 अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न: भारत में कॉलेजियम सिस्टम कैसे काम करता है?

उत्तर: भारत में कॉलेजियम सिस्टम कैसे काम करता है यह जानने के लिए आप ऊपर हमारे द्वारा लिखा गया लेख पढ़ सकते हो।

तो इस तरह से इस लेख के माध्यम से आपने कॉलेजियम सिस्टम के बारे में जानकारी हासिल कर ली है। आपने जाना कि कॉलेजियम सिस्टम क्या है कॉलेजियम सिस्टम कैसे बना यह कैसे काम करता है और इसके फायदे और नुकसान क्या हैं इत्यादि। आशा है कि जो जानकारी लेने के लिए आप इस लेख पर आए थे वह आपको मिल गई होगी। फिर भी यदि कोई प्रश्न आपके मन में शेष है तो आप हम से नीचे कॉमेंट करके पूछ सकते हैं।

लविश बंसल
लविश बंसल
लविश बंसल वर्ष 2010 में लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर साइंस इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया और वहां से वर्ष 2014 में बीटेक की डिग्री ली। शुरुआत से ही इन्हें वाद विवाद प्रतियोगिता में भाग लेना या इससे संबंधित क्षेत्रों में भाग लेना अच्छा लगता था। इसलिए ये काफी समय से लेखन कार्य कर रहें हैं। इनके लेख की विशेषता में लेख की योजना बनाना, ग्राफ़िक्स का कंटेंट देखना, विडियो की स्क्रिप्ट लिखना, तरह तरह के विषयों पर लेख लिखना, सोशल मीडिया कंटेंट लिखना इत्यादि शामिल है।
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